‘जंगल की आग पर लगातार निगरानी की जरूरत’, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया

देहरादून ( ओम प्रकाश सिमल्टी) : सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 2016 के आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें जंगल की आग को नियंत्रित करने और रोकने समेत कई निर्देश दिए गए थे। शीर्ष अदालत ने मामले को विचार के लिए वापस भेज दिया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने कहा, “जैसा कि देखा जा सकता है, उच्च न्यायालय ने एक दशक से भी पहले कई निर्देश जारी किए थे। उन निर्देशों को लागू करने का असर नहीं दिख सका, क्योंकि इस कोर्ट ने 2017 में फैसले पर रोक लगा दी थी। ”
पीठ ने कहा कि इनमें से अधिकांश निर्देशों का उत्तराखंड राज्य और भारत संघ ने काफी हद तक पालन किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंगल में आग लगने की घटनाएं कमोबेश हर साल होती रहती हैं। पीठ ने कहा, “चूंकि फंड के गलत इस्तेमाल, कुप्रबंधन या गलत इस्तेमाल और अधिकारियों की तरफ से प्रतिबद्धता की कमी के आरोप हैं, इसलिए हमें लगता है कि हाई कोर्ट के दिए गए निर्देशों पर, जिन पर इस कोर्ट (सुप्रीम कोर्ट) ने रोक लगा दी थी।हाई कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए, खासकर तब जब एक दशक बीत चुका है और जमीनी स्तर पर साफ तौर पर बदलाव दिख रहे हैं।”
पीठ ने कहा कि बाद की घटनाओं और जंगल की आग को नियंत्रित करने वाली प्रणाली के आधुनिकीकरण और टेक्नोलॉजी की तरक्की को देखते हुए, यह बहुत बहस का मुद्दा बन जाता है कि क्या अधिकारियों को उच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक और ज्यादा कर्मचारियों की जरूरत होगी। राज्य के वकील ने कहा कि वे जंगल में आग लगने की घटनाओं के लिए उपग्रह तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं।
पीठ ने कहा कि जंगल की आग से जुड़े मामलों पर अधिकार क्षेत्र वाले उच्च न्यायालय को “लगातार निगरानी” करने की जरूरत है, जो इससे निपटने के लिए बेहतर तरीके से तैयार है।
शीर्ष अदालत ने कहा, “इसी तरह, यह एक ऐसा मामला है, जहां हम वरिष्ठ वकील राजीव दत्ता से अनुरोध करते हैं कि वे न्याय-मित्र के तौर पर हाई कोर्ट की मदद करें, बेहतर होगा, ऑनलाइन पेशी के जरिये।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को उच्च न्यायालय को भेज दिया ताकि वह उठे सवालों पर फिर से विचार कर सके और बदले हुए हालात में जरूरत के हिसाब से संशोधित निर्देश जारी कर सके।
पीठ ने उच्च न्यायालय से कुछ उचित समय के लिए उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करने को कहा। पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने मार्च 2017 में उच्च न्यायालय के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी।
उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश हुए जतिंदर कुमार सेठी ने पीठ को बताया कि हाल के वर्षों में जंगल में आग लगने की घटनाओं में कमी आई है, क्योंकि ऐसी घटनाओं को रोकने और नियंत्रित करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं।
पीठ ने कहा कि जंगल की आग से निपटने के लिए एक मजबूत तंत्र बनाना होगा। पीठ ने कहा, “जंगल में आग लगना भी एक प्राकृतिक चीज है… इसके लगने के कई कारण हैं. कभी इंसानों की वजह से, कभी जंगल माफिया की वजह से।



