बंदूक छोड़ रंगमंच से जुड़े नक्सली: ‘नितारा’ (NITARA) संस्था कर रही आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों का रचनात्मक पुनर्वास

विवेक ओझा/ रायपुर / नई दिल्ली: देश के वामपंथी उग्रवाद (LWE) प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों के लिए एक नई और सकारात्मक उम्मीद जगी है। छत्तीसगढ़ और आसपास के राज्यों में काम कर रही ‘नितारा’ (NITARA) नामक एक गैर-सरकारी संस्था ने आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व नक्सलियों (Ex-Naxals) के पुनर्वास के लिए एक बेहद अनोखी और रचनात्मक पहल शुरू की है। यह संस्था इन युवाओं को लोक रंगमंच (Folk Theatre) और स्थानीय कला के जरिए समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रही है।
नितारा की टीम पूर्व नक्सलियों को अभिनय, गायन, नाटक लेखन और स्थानीय वाद्ययंत्र बजाने की ट्रेनिंग दे रही है। जिन हाथों में कभी राइफलें हुआ करती थीं, वे अब रंगमंच के मंच पर समाज को शांति, शिक्षा और विकास का संदेश दे रहे हैं। इन नाटकों की कहानियां अक्सर उनके खुद के भटके हुए जीवन, जंगल के संघर्ष और फिर हिंसा छोड़कर शांति की ओर लौटने की वास्तविक घटनाओं पर आधारित होती हैं। इन नाटकों का मंचन सुदूर आदिवासी गांवों में किया जा रहा है, जिससे अन्य भटके हुए युवाओं को भी हिंसा का रास्ता छोड़ने की प्रेरणा मिल रही है।
गृह मंत्रालय और राज्य सरकारों ने भी ‘नितारा’ के इस कलात्मक पुनर्वास मॉडल की सराहना की है। अधिकारियों का मानना है कि केवल आर्थिक पैकेज देना ही पुनर्वास के लिए पर्याप्त नहीं है; पूर्व नक्सलियों के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक एकीकरण (Psychological Integration) के लिए कला और संस्कृति एक बेहद शक्तिशाली माध्यम है। इस पहल से न केवल इन युवाओं को आजीविका का सम्मानजनक साधन मिल रहा है, बल्कि समाज में उन्हें स्वीकार्यता (Acceptance) भी प्राप्त हो रही है।



