खदानों और खनिज भूमि पर टैक्स लगाने का अधिकार किसका?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के निपटारे के लिए नई संविधान पीठ का किया गठन
सरिता त्रिपाठी/ नई दिल्ली: देश के खनिज-समृद्ध राज्यों और केंद्र सरकार के बीच दशकों से चले आ रहे एक बड़े कानूनी और वित्तीय विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक अहम कदम उठाया है। खदानों और खनिज वाली भूमि (Mineral-bearing lands) पर कर (Tax) लगाने और रॉयल्टी वसूलने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है या केंद्र के पास, इस जटिल संवैधानिक प्रश्न पर अंतिम फैसला सुनाने के लिए सर्वोच्च अदालत ने एक नई 9-सदस्यीय संविधान पीठ (Constitution Bench) का गठन किया है।
यह विवाद मुख्य रूप से ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957’ (MMDR Act) की व्याख्या से जुड़ा है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे खनिज संपन्न राज्यों का तर्क है कि भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची (State List) के तहत उन्हें अपनी भूमि पर मौजूद खनिजों पर अतिरिक्त कर या सेस (Cess) लगाने का संप्रभु अधिकार है। उनका कहना है कि खनन गतिविधियों के कारण पर्यावरण का नुकसान और विस्थापन राज्यों को झेलना पड़ता है, इसलिए उन्हें रॉयल्टी के अलावा अतिरिक्त राजस्व की आवश्यकता है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार और विभिन्न खनन कंपनियों (Mining Companies) का तर्क है कि MMDR एक्ट के लागू होने के बाद, खनिजों पर रॉयल्टी और कर तय करने का विशेष अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। खनन कंपनियों का कहना है कि यदि राज्य सरकारों को अलग से कर लगाने की अनुमति दी गई, तो देश में खनिजों (जैसे कोयला, लौह अयस्क) की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सीधा असर बिजली उत्पादन, इस्पात उद्योग और देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली इस नई संविधान पीठ के समक्ष 80 से अधिक याचिकाएं सूचीबद्ध हैं, जो विभिन्न उच्च न्यायालयों के फैसलों को चुनौती देती हैं। 1989 के ऐतिहासिक ‘इंडिया सीमेंट लिमिटेड’ मामले के फैसले पर भी इस पीठ द्वारा पुनर्विचार किया जाएगा। कानूनी और आर्थिक विशेषज्ञों की नजर इस सुनवाई पर टिकी है, क्योंकि इस फैसले का सीधा असर न केवल राज्यों के खजाने (State Exchequer) पर पड़ेगा, बल्कि भारत के पूरे खनन क्षेत्र (Mining Sector) की भविष्य की नीतियों को भी नया आकार देगा।