जम्मू-कश्मीर चुनाव पर ECI की दो टूक: संयुक्त राष्ट्र दूतों की चिंताओं को बताया ‘निराधार और पारदर्शी प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ’

पल्लवी श्रीवास्तव/ नई दिल्ली: भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने देश की संप्रभुता और अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की रक्षा करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ा संदेश दिया है। जम्मू-कश्मीर में होने वाले आगामी चुनावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के कुछ विशेष दूतों द्वारा उठाई गई चिंताओं और टिप्पणियों को चुनाव आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया है। आयोग ने इन टिप्पणियों को न केवल ‘निराधार’ करार दिया, बल्कि इसे भारत की मजबूत और ‘पारदर्शी चुनावी व्यवस्था से पूरी तरह अनभिज्ञ’ भी बताया है।
विवाद की जड़ क्या है?
दरअसल, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से जुड़े कुछ स्वतंत्र विशेषज्ञों और विशेष दूतों ने हाल ही में एक बयान जारी किया था। इस बयान में जम्मू-कश्मीर में परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया, मतदाता सूची में संशोधन और चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की तैनाती पर सवाल उठाते हुए इसे स्थानीय प्रतिनिधित्व को प्रभावित करने वाला कदम बताया था। उन्होंने चुनाव के दौरान मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर ‘कथित’ चिंताएं व्यक्त की थीं।
चुनाव आयोग का कड़ा और स्पष्ट जवाब:
चुनाव आयोग ने एक विस्तृत और सख्त बयान जारी कर अंतरराष्ट्रीय दूतों के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। ECI ने स्पष्ट किया:
- 1. परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया: जम्मू-कश्मीर में परिसीमन का काम एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग द्वारा पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से, जन सुनवाई के बाद और भारत के संविधान के दायरे में किया गया है।
- 2. स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की गारंटी: भारत का चुनाव आयोग दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे सम्मानित चुनाव प्रबंधन निकाय है। चुनाव प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दलों, पर्यवेक्षकों (Observers) और मीडिया की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित की जाती है।
- 3. सुरक्षा बलों की तैनाती: आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों में मतदाताओं को भयमुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती एक अनिवार्य और मानक प्रक्रिया है, न कि मतदाताओं को डराने का साधन।
आंतरिक मामलों में दखलंदाजी अस्वीकार्य
विदेश मंत्रालय के समन्वय से दिए गए इस जवाब में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है। वहां चुनाव कराना, मतदाता सूची अपडेट करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं को बहाल करना पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है। इसमें किसी भी बाहरी संस्था, चाहे वह संयुक्त राष्ट्र के दूत ही क्यों न हों, का अवांछित हस्तक्षेप या पूर्वाग्रह से ग्रसित टिप्पणी भारत को कतई बर्दाश्त नहीं है।
भारत की इस कूटनीतिक और प्रशासनिक दृढ़ता ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह साफ संदेश दे दिया है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र की बहाली भारत के अपने संविधान और चुनाव आयोग की निष्पक्ष प्रक्रियाओं के तहत ही होगी।



