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लखनऊ अग्निकांड पर कड़ा एक्शन: मुख्य आरोपी इमारत मालिक वीरेंद्र शुक्ला और भाई गिरफ्तार, घोर लापरवाही में LDA के 3 जूनियर इंजीनियर सस्पेंड

अभिषेक सिंह/ लखनऊ: राजधानी लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) इलाके में 15 युवा छात्रों की जान लेने वाले भीषण कोचिंग अग्निकांड के बाद आखिरकार प्रशासनिक अमला गहरी नींद से जाग गया है। चौतरफा जनआक्रोश, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त निर्देशों और इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद प्रशासन ने इस मामले में पहली बड़ी और दंडात्मक कार्रवाई की है।

लखनऊ पुलिस ने इस अवैध व्यावसायिक इमारत के मुख्य मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और उनके दो भाइयों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, दूसरी ओर भारी दबाव के बीच लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने भी अपने विभाग में ‘सफाई’ अभियान शुरू करते हुए कर्तव्य में घोर लापरवाही बरतने के आरोप में तीन जूनियर इंजीनियरों (JEs) को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) कर दिया है।

पुलिस की रडार पर मालिक: गैर-इरादतन हत्या का केस दर्ज

अलीगंज पुलिस ने बीती रात एक अहम छापेमारी में इमारत के मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और उनके भाइयों (सुरेंद्र और धीरेंद्र शुक्ला) को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस प्रशासन के अनुसार, इन आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सख्त धाराओं के तहत एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है।

आरोपियों पर मुख्य रूप से निम्नलिखित मामले दर्ज किए गए हैं:

* गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide): पैसों के लालच में छात्रों की जान जोखिम में डालने और सुरक्षा के बुनियादी इंतजाम न करने के लिए।

* धोखाधड़ी और जालसाजी: आवासीय (Residential) नक्शे पर पास की गई इमारत को गुपचुप तरीके से एक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स (कोचिंग और पेट शॉप) में तब्दील करने के लिए।

* अग्निशमन नियमों का उल्लंघन: बिना ‘फायर एनओसी’ (Fire NOC) और आपातकालीन निकास के इमारत को किराये पर देने के लिए।

पूछताछ में यह भी सामने आया है कि वीरेंद्र शुक्ला और उनके भाई इस इमारत से हर महीने लाखों रुपये का किराया वसूल रहे थे, लेकिन जब छात्रों की सुरक्षा के लिए अग्निशमन यंत्र (Fire Extinguishers) या आपातकालीन सीढ़ियां लगाने की बात आई, तो उन्होंने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।

एलडीए (LDA) की दिखावटी या वास्तविक कार्रवाई?

इस हादसे ने सीधे तौर पर लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़े सवाल खड़े किए हैं। आखिर शहर के बीचों-बीच एक आवासीय इमारत कैसे इतने सालों तक कमर्शियल सेंटर के रूप में चलती रही?

अपनी साख बचाने और हाई कोर्ट के गुस्से से बचने के लिए LDA के उपाध्यक्ष (VC) ने आज एक आदेश जारी कर उस क्षेत्र के तीन जूनियर इंजीनियरों (JEs) को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। इन इंजीनियरों पर आरोप है कि:

* उन्होंने अपने ड्यूटी क्षेत्र में हो रहे इस अवैध व्यावसायिक निर्माण और गतिविधियों की कभी रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को नहीं दी।

* बिल्डिंग बायलॉज (Building Bye-laws) और जोनिंग नियमों के खुले उल्लंघन पर आंखें मूंदे रखीं।

हालांकि, एलडीए के कई पूर्व अधिकारियों और जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी बहुमंजिला इमारत का अवैध संचालन केवल कुछ जूनियर इंजीनियरों की मिलीभगत से संभव नहीं है। इस भ्रष्टाचार के तार प्राधिकरण के कई बड़े अधिकारियों और ‘बाबू-नेताओं’ के गठजोड़ तक जुड़े हुए हैं।

‘बड़ी मछलियों’ पर कब गिरेगी गाज?

> एक पत्रकार के नज़रिए से इस पूरी कार्रवाई का विश्लेषण किया जाए, तो यह पुलिस और एलडीए का ‘डैमेज कंट्रोल’ (Damage Control) अधिक लगता है। इमारत के मालिकों की गिरफ्तारी कानूनन जरूरी थी और यह एक सही कदम है। लेकिन एलडीए द्वारा मात्र 3 जूनियर इंजीनियरों को सस्पेंड करना उस ‘सिस्टमैटिक भ्रष्टाचार’ (Systemic Corruption) पर पर्दा डालने की कोशिश है जो बरसों से लखनऊ के हर इलाके में पनप रहा है।

> जब तक इस ‘नेक्सस’ (Nexus) में शामिल जोनल अधिकारियों, बड़े इंजीनियरों और फायर डिपार्टमेंट के उन अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज नहीं होता जो एनओसी के नाम पर रिश्वत वसूलते हैं, तब तक ऐसे हादसे नहीं रुकेंगे। 15 बच्चों की चिताएं यह सवाल पूछ रही हैं कि क्या इस सस्पेंशन से वह सिस्टम सुधर जाएगा जिसने चंद रुपयों के लिए इन मासूमों को उस ‘गैस चैंबर’ में मरने के लिए छोड़ दिया था?

फिलहाल, पुलिस ने इमारत को पूरी तरह से सील कर दिया है और फोरेंसिक टीमें आग लगने के असली कारणों (शॉर्ट सर्किट या अन्य) की तकनीकी जांच के लिए सुबूत जुटा रही हैं। अब जनता की नजर इस बात पर है कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुए प्रदेशव्यापी ‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ में और कितने भ्रष्ट अधिकारियों के चेहरे बेनकाब होते हैं।

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