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G7 समिट का ऐतिहासिक समापन

'क्लाइमेट फंडिंग' और 'AI' की बेलगाम रफ्तार पर कसा कड़ा शिकंजा, फ्रांस से जारी हुआ सख्त वैश्विक घोषणापत्र

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नीस (फ्रांस)/नई दिल्ली | फ्रांस के खूबसूरत तटीय शहर नीस (Nice) में पिछले तीन दिनों से चल रहा दुनिया के सात सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देशों (G7) का महामंथन आज एक ऐतिहासिक और कड़े घोषणापत्र के साथ संपन्न हो गया। 2026 के इस शिखर सम्मेलन ने वैश्विक कूटनीति के एजेंडे को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। इसने यह साबित कर दिया है कि दुनिया के सामने अब सबसे बड़ा खतरा केवल पारंपरिक युद्ध या भौगोलिक सीमाएं नहीं हैं, बल्कि ‘बेलगाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (Artificial Intelligence) और तेजी से बिगड़ता ‘जलवायु परिवर्तन’ (Climate Change) है। G7 देशों के नेताओं ने इन दोनों ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दों पर एक साझा और सख्त ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर किए हैं, जो भविष्य की वैश्विक नीतियों की दिशा तय करेगा।

क्लाइमेट फंडिंग: अमीर देशों की तय हुई जवाबदेही और ‘लॉस एंड डैमेज’ पर मुहर

अब तक के कई जलवायु सम्मेलनों में विकसित देशों पर केवल खोखले वादे करने और विकासशील देशों को उनके हाल पर छोड़ देने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं। लेकिन नीस में जारी G7 के अंतिम घोषणापत्र में ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ (जलवायु वित्तपोषण) को लेकर एक ठोस और जवाबदेह रोडमैप तैयार किया गया है।

घोषणापत्र के अनुसार, G7 देशों ने ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील और गरीब देशों) को ग्रीन एनर्जी ट्रांसिशन (हरित ऊर्जा परिवर्तन) और कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कई सौ अरब डॉलर के नए और बिना शर्त वाले फंड को मंजूरी दी है। यह फंड मुख्य रूप से उन देशों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए दिया जाएगा जो जलवायु परिवर्तन के सबसे भयंकर और प्रत्यक्ष परिणाम (जैसे अचानक आने वाली बाढ़, लंबा सूखा और समुद्री जलस्तर का बढ़ना) भुगत रहे हैं।

AI रेगुलेशन: ‘डीपफेक’ और ‘ऑटोमेशन’ पर पहली वैश्विक लगाम

सम्मेलन का दूसरा सबसे बड़ा और अभूतपूर्व मुद्दा रहा—आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का विनियमन। एआई ने जिस तरह से दुनिया के लोकतांत्रिक चुनावों, रोजगार (Job Market) और साइबर सुरक्षा के लिए एक ‘अस्तित्व का संकट’ (Existential Threat) पैदा कर दिया है, उस पर G7 नेताओं ने गहरी चिंता व्यक्त की है।

घोषणापत्र में एआई के विकास और उपयोग के लिए एक सख्त ‘ग्लोबल एथिकल फ्रेमवर्क’ (वैश्विक नैतिक ढांचा) का ऐलान किया गया है। इसके तहत अब बड़ी टेक कंपनियों को अपने एआई मॉडल्स को बाज़ार में उतारने से पहले एक सख्त सुरक्षा और पारदर्शिता ऑडिट से गुज़रना होगा। डीपफेक (Deepfake) तकनीक को नियंत्रित करने, कॉपीराइट का सम्मान करने और एआई द्वारा हथियारों के स्वचालित संचालन (Autonomous Weapons) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसी सख्त बातें इस ड्राफ्ट का मुख्य हिस्सा हैं।

बदलता G7 और भारत का बढ़ता प्रभाव

एक भू-राजनीतिक विश्लेषक के नज़रिए से इस सम्मेलन को देखा जाए, तो G7 अब अपनी पारंपरिक ‘अमीर देशों के बंद क्लब’ वाली छवि से बाहर निकलने की ज़बरदस्त कोशिश कर रहा है। आज ब्रिक्स (BRICS) और ग्लोबल साउथ की बढ़ती आर्थिक ताकत ने G7 को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे दुनिया के बाकी देशों को दरकिनार कर अपनी नीतियां नहीं थोप सकते।

भारत भले ही G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सम्मेलन में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में उपस्थिति और उनकी कूटनीतिक वार्ताएं यह साबित करती हैं कि बिना भारत की भागीदारी के न तो क्लाइमेट चेंज की जंग जीती जा सकती है और न ही एआई के वैश्विक नियम बनाए जा सकते हैं। भारत ने हमेशा से ‘क्लाइमेट जस्टिस’ (जलवायु न्याय) और ‘एआई फॉर ऑल’ (AI for All) की वकालत की है, जिसकी स्पष्ट और मजबूत झलक इस जी-7 घोषणापत्र में देखने को मिली है।

आगे की राह: क्या धरातल पर उतरेंगे वादे?

नीस का यह शानदार घोषणापत्र केवल कूटनीतिक पन्नों का हिस्सा बनकर नहीं रहना चाहिए। इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी कांग्रेस, यूरोपीय संसद और अन्य सदस्य देश इन वादों को अपने घरेलू कानूनों में कितनी जल्दी और ईमानदारी से लागू करते हैं। 21वीं सदी के इन दो सबसे बड़े संकटों (AI और जलवायु) पर G7 का यह साझा रुख एक मजबूत शुरुआत जरूर है, लेकिन इसके ‘ठोस परिणामों’ और ज़मीनी प्रभाव का इंतज़ार आज पूरी दुनिया कर रही है।

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