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‘सफेदपोश’ भ्रष्टाचार का बड़ा भंडाफोड़

IDFC फर्स्ट और AU फाइनेंस बैंक के ₹661 करोड़ के महाघोटाले में CBI की ताबड़तोड़ छापेमारी, नौकरशाहों पर भी कसी नकेल

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नई दिल्ली | देश के बैंकिंग और प्रशासनिक ढांचे में आज उस वक्त भारी हड़कंप मच गया जब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एक बड़े और संगठित वित्तीय घोटाले के खिलाफ अपना सबसे बड़ा ‘ऑपरेशन’ शुरू किया। IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक से जुड़े ₹661 करोड़ के सनसनीखेज फंड गबन मामले में CBI ने आज सुबह से ही देश के 6 से अधिक प्रमुख ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की है। चंडीगढ़, पंचकूला और दिल्ली-NCR में एक साथ चल रही इस रेड ने यह साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार की यह दीमक सिर्फ कॉरपोरेट दफ्तरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राज्य के शीर्ष सरकारी अधिकारियों की भी गहरी और खतरनाक मिलीभगत है।

क्या है ₹661 करोड़ का यह वित्तीय महाघोटाला?
CBI की जांच के मुताबिक, यह कोई सामान्य बैंक फ्रॉड या लोन डिफॉल्ट का मामला नहीं है, बल्कि सरकारी खजाने को लूटने की एक बेहद सुनियोजित और शातिर साजिश है। इस घोटाले की आंच सीधे तौर पर हरियाणा सरकार के 8 अहम विभागों और चंडीगढ़ प्रशासन (जिसमें नगर निगम चंडीगढ़ और CREST शामिल हैं) तक पहुंचती है।

आरोप है कि इन सरकारी विभागों का जो करोड़ों रुपये का फंड IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक में जमा (Parked) किया गया था, उसे बैंक के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और हरियाणा कैडर के वरिष्ठ लोक सेवकों ने आपसी साठगांठ से ठिकाने लगा दिया। जनता के विकास और अहम सरकारी परियोजनाओं के लिए आवंटित इस पैसे को फर्जी खातों और शेल ट्रांजैक्शन के जरिए सिस्टम से बाहर निकाल लिया गया।

नोएडा की ‘विपम कंसल्टेंसी’ और घोटाले का सिंडिकेट
जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस पूरे गबन का ‘रूटिंग हब’ (Routing Hub) नोएडा स्थित ‘विपम कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड’ (Vipam Consultancy Pvt Ltd) थी। बैंक अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर बिना उचित वेरिफिकेशन के खाते खोले और फंड को डायवर्ट करने में मदद की। सरकारी खजाने के पैसे को ‘अपराध से अर्जित आय’ (Proceeds of Crime) के रूप में विपम कंसल्टेंसी के खातों में ट्रांसफर किया गया। बाद में इस काली कमाई को कंपनी के निदेशक के निजी खातों में भेज दिया गया।

इस पूरी हेराफेरी पर आंखें मूंद लेने, नियमों को दरकिनार करने और इस सिंडिकेट को प्रशासनिक ‘कवर फायर’ देने के बदले में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने भारी रिश्वत और अनुचित लाभ (Undue Advantages) लिए।

CBI का कड़ा एक्शन और चार्जशीट का धमाका
CBI की कई टीमों ने एक साथ वरिष्ठ अधिकारियों के आवासों और विपम कंसल्टेंसी के दफ्तरों पर धावा बोला। जांच एजेंसी ने मौके से अहम दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस (लैपटॉप, मोबाइल फोन) और कई बेनामी संपत्तियों के कागजात जब्त किए हैं। इस मामले में CBI ने पंचकूला की विशेष अदालत में अपनी पहली विस्तृत चार्जशीट भी दाखिल कर दी है। इस चार्जशीट में हरियाणा पावर जेनरेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद से जुड़े अधिकारियों की भूमिका और घोटाले की पूरी ‘मोडस ऑपरेंडी’ (Modus Operandi) का कच्चा चिट्ठा खोल दिया गया है।

सिस्टम की साख और कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर उठते गंभीर सवाल
यह पूरा घटनाक्रम भारतीय बैंकिंग सिस्टम और नौकरशाही के बीच पनप रहे उस जहरीले गठजोड़ को उजागर करता है, जो सरकारी खजाने को निजी जागीर समझकर खोखला कर रहा है। जब सिस्टम के रक्षक ही इस लूट में शामिल हो जाएं, तो पारदर्शिता के तमाम दावे बेमानी हो जाते हैं। IDFC फर्स्ट और AU स्मॉल फाइनेंस जैसे उभरते हुए बैंक, जो अपनी तेज ग्रोथ और आधुनिक बैंकिंग के लिए शेयर बाजार में निवेशकों के चहेते माने जाते हैं, उनके भीतर इस स्तर की चूक और धोखाधड़ी उनके ‘रिस्क मैनेजमेंट’ (Risk Management) और आंतरिक ऑडिट सिस्टम पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाती है।

यह मामला सिर्फ ₹661 करोड़ की वित्तीय चोरी का नहीं है; यह उस भरोसे की चोरी है जो देश का एक आम करदाता (Taxpayer) इस व्यवस्था पर करता है। CBI की इस ताबड़तोड़ कार्रवाई से यह स्पष्ट संदेश गया है कि वित्तीय अपराध चाहे सरकारी फाइलों के पीछे रचे गए हों या कॉर्पोरेट बैलेंस शीट की आड़ में, उसकी जवाबदेही हर हाल में तय होगी। आने वाले कुछ ही दिनों में इस मामले में कई और ‘सफेदपोश’ चेहरों के बेनकाब होने और बड़ी गिरफ्तारियों की पूरी संभावना है।

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