भीड़ नियंत्रण या मानवाधिकारों का हनन? पेलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

पल्लवी श्रीवास्तव/ नई दिल्ली: विरोध प्रदर्शनों और हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली विवादित ‘पेलेट गन’ (Pellet Guns) का मुद्दा एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंच गया है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों के एक समूह ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा पेलेट गन के उपयोग पर तत्काल और पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है। याचिकाकर्ताओं ने इसे क्रूर, अमानवीय और जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन बताया है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि पेलेट गन को ‘गैर-घातक’ (Non-lethal) हथियार कहकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। जब बंदूक से फायर किया जाता है, तो सैकड़ों छोटे लोहे या सीसे के छर्रे (Pellets) तेज़ गति से निकलते हैं, जिनकी दिशा को नियंत्रित करना असंभव होता है। याचिका में मेडिकल रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए बताया गया है कि हालिया प्रदर्शनों और कश्मीर घाटी के इतिहास में इन छर्रों के कारण सैकड़ों युवाओं और निर्दोष राहगीरों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई है और कई लोगों की मौत भी हुई है।
सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि सरकार और पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पेलेट गन के बजाय आंसू गैस, पानी की बौछार (Water cannons) या अन्य आधुनिक और सुरक्षित तकनीकों का उपयोग करने का निर्देश दिया जाए। दूसरी ओर, सुरक्षा बलों का अक्सर यह तर्क रहा है कि जब उग्र भीड़ पुलिस पर जानलेवा पथराव करती है, तो आत्मरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में इसका इस्तेमाल करना मजबूरी बन जाता है। अब सभी की नज़रें इस बात पर हैं कि मुख्य न्यायाधीश की पीठ इस संवेदनशील मामले को सुनवाई के लिए स्वीकार करती है या नहीं, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवाधिकारों के बीच संतुलन का एक जटिल मुद्दा है।



