पेपर लीक रोकथाम के लिए कानून को सख्त बनाने वाला विधेयक लोकसभा से पारित

नई दिल्ली : लोकसभा में पेपर लीक से जुड़े मामलों में मौजूदा कानून को अधिक कठोर किए जाने वाला संशोधन विधेयक शोर-शराबे के बीच बुधवार को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री डॉ जितेन्द्र सिंह ने कहा कि उन्हें आशा थी कि सकारात्मक सुझाव प्राप्त होंगे लेकिन इस विषय पर राजनीति करने का प्रयास किया गया।
डॉ. सिंह ने लोकसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक-2026 पर कल से शुरु हुई चर्चा पर आज जवाब दिया। विधेयक के पारित होने के बाद लोकसभा की कार्यवाही कल तक के लिए स्थगित कर दी गई।
डॉ सिंह ने बताया कि सदन में इस विधेयक पर अनेक सदस्यों ने अपने सुझाव दिए। लगभग 40 से 45 वक्ताओं ने चर्चा में भाग लिया और विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे। हालांकि उन्हें नेता प्रतिपक्ष के व्यवहार पर हैरानी हुई। उन्होंने कहा, “हमें नेता प्रतिपक्ष के व्यवहार पर हैरानी है। उन्होंने जिन अपशब्दों का इस्तेमाल किया, वे न केवल संसदीय मर्यादा के विरुद्ध हैं, बल्कि सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं के भी प्रतिकूल हैं।”
उन्होंने कहा कि जनवरी 2024 में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम लागू किया गया था। हालांकि हाल की घटनाओं के बाद सरकार ने विशेषज्ञों की सलाह और अनुभव के आधार पर इसे और अधिक प्रभावी बनाने का निर्णय लिया। पहले भी यह अपराध संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौतायोग्य था, लेकिन अब इसके प्रावधान और सख्त किए गए हैं।
उन्होंने बताया कि कदाचार में शामिल व्यक्तियों के लिए सजा तीन से पांच वर्ष के स्थान पर पांच से दस वर्ष कर दी गई है तथा जुर्माना बढ़ाकर 50 लाख रुपये तक किया गया है। सेवा प्रदाताओं पर अधिकतम जुर्माना एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दिया गया है और उन्हें आठ वर्षों तक परीक्षा संचालन से वंचित किया जा सकेगा। निदेशकों और प्रबंधन से जुड़े दोषियों के लिए भी सजा और जुर्माने में वृद्धि की गई है। संगठित अपराध के मामलों में न्यूनतम सजा बढ़ाकर सात वर्ष कर दी गई है तथा जुर्माना बढ़ाकर 10 करोड़ रुपये तक करने का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि 2024 में कानून बनने के बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई। पिछले दो वर्षों में इस कानून के तहत 52 एफआईआर दर्ज की गई हैं। इनमें 29 मामले अनुचित साधनों की रोकथाम से जुड़े हैं, जबकि 23 मामले भारतीय न्याय संहिता के विभिन्न प्रावधानों के अंतर्गत दर्ज किए गए हैं।
उन्होंने कहा कि हाल ही में सामने आए पेपर लीक मामले की सूचना 7 और 8 जुलाई की रात को मिली। 12 जुलाई को जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दी गई। अगले ही दिन 13 लोगों को हिरासत में लिया गया और लगभग 92 स्थानों पर छापेमारी की गई। सरकार के अनुसार, सीबीआई ने शीघ्रता से जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल किया और नए कानून के तहत मुकदमे की सुनवाई भी शुरू हो गई, जिससे लगभग पांच महीने के भीतर निर्णय आने की व्यवस्था है।
अपनी सरकार में शिक्षा के क्षेत्र की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। विश्वविद्यालयों की संख्या 760 से बढ़कर 1,293 हो गई है। उच्च शिक्षा संस्थानों की संख्या 51,534 से बढ़कर 64,896 तक पहुंची है। इसी अवधि में आदिवासी विद्यार्थियों के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का विस्तार किया गया तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू की गई।
उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। एम्स की संख्या 7 से बढ़ाकर 22 कर दी गई है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 844 हो गई है। एमबीबीएस सीटें लगभग 51,300 से बढ़कर 1.39 लाख तक पहुंच गई हैं, जबकि स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार का कहना है कि इन कदमों से देश में डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ेगी।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आत्महत्या संवेदनशील विषय है और इनके आंकड़ों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। हाल के वर्षों में पेपर लीक से जुड़े कारणों से होने वाली आत्महत्या की घटनाओं में कमी आई है। सरकार ने विश्वास व्यक्त किया कि नए और अधिक कठोर कानून से सार्वजनिक परीक्षाओं की पारदर्शिता बढ़ेगी तथा विद्यार्थियों का विश्वास मजबूत होगा।
आंदोलनरत छात्रों पर कार्रवाई के मुद्दे पर सिंह ने कहा कि पूरी कार्रवाई के दौरान सुरक्षा बलों ने अधिकतम संयम का परिचय दिया। यह सुनिश्चित किया गया कि किसी प्रकार की जनहानि न हो। प्रशासन का उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना था, न कि किसी को नुकसान पहुंचाना। उन्होंने इस बात का खंडन किया कि गृहमंत्री ने छात्र आंदोलन में गोली चलाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि हम स्वयं विधायक और सांसद रहे हैं तथा प्रशासनिक प्रक्रिया से परिचित हैं। गोली चलाने का आदेश कोई मंत्री नहीं देता। ऐसा आदेश देने का अधिकार कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जैसे एसडीएम या डीएम के पास होता है। केवल भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अश्रु गैस का प्रयोग किया गया।
सिंह ने असम आंदोलन का उदाहरण देते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि असम में 1969 से 1984 के बीच कांग्रेस की सरकार के दौरान ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के आंदोलन के दौरान लगभग 860 निर्दोष लोगों की मृत्यु हुई थी और इनमें अधिकांश छात्र थे।
उन्होंने कहा कि चर्चा के दौरान यह दावा किया गया कि 150 बार पेपर लीक हुए और उससे 750 करोड़ विद्यार्थी प्रभावित हुए। सरकार का कहना है कि ऐसे आंकड़ों को बिना प्रमाण के प्रस्तुत करना उचित नहीं है। तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर ही चर्चा होनी चाहिए।
डॉ. सिंह ने इस बात की आलोचना की कि नेता प्रतिपक्ष प्रधानमंत्री के आवास 7, लोक कल्याण मार्ग पर धरने पर बैठ गए। उन्होंने कटाक्ष किया कि यह उनकी निराशा और हताशा है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बन सके तो स्वयं प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठ गए।



