निर्मला सीतारामन ने नई दिल्ली से ‘ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट’ पर आयोजित वर्चुअल बैठक में लिया भाग

नई दिल्ली (राघवेंद्र प्रताप सिंह) : केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट कार्य मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन ने आज नई दिल्ली से ‘ग्लोबल कन्वर्जेंस फॉर ग्रोथ समिट’ पर आयोजित एक वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया। यह समिट विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के नीति-निर्धारकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था, ताकि एक कुशल ग्लोबल फ्रेमवर्क के भीतर संतुलित विकास को बढ़ावा देने के उपायों पर चर्चा की जा सके। फ्रांस के राष्ट्रपति महामहिम श्री इमैनुएल मैक्रों की अध्यक्षता में आयोजित इस समिट में G7 देशों, भारत, ब्राजील, चीन, केन्या, दक्षिण कोरिया के शीर्ष नेतृत्व और आईएमएफ के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
समिट में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने संबोधन में वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारामन ने कहा, “आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में समृद्धि और चुनौतियां साझा हैं, लेकिन संघर्षों और अनिश्चितता का परिणाम विकासशील देशों और ‘ग्लोबल साउथ’ पर बहुत ज़्यादा पड़ता है। इस स्थिति में दुनिया को मिलकर कदम उठाने की जरूरत है। हमें मजबूत अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण, सतत विकास में तेजी लाने और समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करना होगा, ताकि इसका लाभ सभी तक पहुंच सके।
वैश्विक आर्थिक विषमताओं के मुद्दे पर केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा, “सभी असंतुलन एक जैसे नहीं होते; कुछ जनसांख्यिकी, विकास के चरणों, संसाधनों की उपलब्धता या आर्थिक संरचनाओं में भिन्नता को दर्शाते हैं। इसलिए, हमारा ध्यान अत्यधिक और निरंतर बने रहने वाले असंतुलनों पर केंद्रित रहना चाहिए, साथ ही हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि अलग-अलग देशों के बीच घरेलू जरूरतों का स्तर काफी भिन्न होता है।
केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि हाल के घटनाक्रमों ने विशेष रूप से क्रिटिकल मिनरल्स के लिए मजबूत, विविध और भौगोलिक रूप से वितरित सप्लाई चेन के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सर्कुलरिटी, रीसाइक्लिंग और अर्बन माइनिंग पर ध्यान केंद्रित करके दुनिया के सामने आ रही आपूर्ति संबंधी चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है।
ग्लोबल साउथ की ओर से बात रखते हुए श्रीमती निर्मला सीतारामन ने आगे कहा, “सुधार का बोझ उन देशों पर नहीं पड़ना चाहिए जो इन समस्याओं के कारण नहीं हैं। भारत, कई अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तरह, वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव पैदा करने या बढ़ाने में मुख्य रूप से शामिल नहीं रहा है, फिर भी, हमें इनके गलत प्रभावों का सामना करना पड़ रहा है।



