‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफनाक जाल
आपके ही घर में आपको बंधक बनाने वाले साइबर ठगों के खिलाफ NHRC का कड़ा एक्शन, जानिए कैसे काम करता है यह सिंडिकेट

नई दिल्ली/ विवेक ओझा | कल्पना कीजिए कि आप अपने बेडरूम में बैठे हैं। अचानक आपके फोन पर एक वीडियो कॉल आती है। स्क्रीन पर पुलिस या सीबीआई की वर्दी में एक शख्स नज़र आता है। बैकग्राउंड में एक असली दिखने वाला पुलिस स्टेशन है। वह शख्स कड़क आवाज़ में आपको बताता है कि आपके आधार कार्ड या पार्सल का इस्तेमाल ड्रग्स तस्करी या मनी लॉन्ड्रिंग में हुआ है। वह आपको धमकाता है कि आप कैमरे के सामने से नहीं हट सकते, न ही किसी से बात कर सकते हैं। इसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ (Digital Arrest) कहा जाता है। यह कोई हॉलीवुड फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि भारत में तेज़ी से फैल रहा वह खौफनाक साइबर आतंकवाद है जिसने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को भी हिलाकर रख दिया है।
इस गंभीर खतरे को भांपते हुए, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए NHRC ने एक उच्च-स्तरीय ओपन हाउस चर्चा का आयोजन किया। यह महज़ एक रूटीन बैठक नहीं थी, बल्कि साइबर सुरक्षा एजेंसियों, पुलिस के आला अधिकारियों और नीति निर्माताओं को एक मंच पर लाकर इस संगठित अपराध की कमर तोड़ने का एक ‘एक्शन प्लान’ था।
मनोवैज्ञानिक आतंक का खेल: कैसे काम करता है ‘डिजिटल अरेस्ट’?
इस अपराध की सबसे डरावनी बात यह है कि इसमें कोई हथियार इस्तेमाल नहीं होता; ठग पीड़ित के दिमाग और उसके डर से खेलते हैं। पीड़ित को वीडियो कॉल पर घंटों तक स्क्रीन के सामने बैठने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें यकीन दिलाया जाता है कि अगर उन्होंने कॉल काटी, तो अगले 10 मिनट में उनके घर पुलिस की जीप पहुंच जाएगी और उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। इस दहशत के साये में, पीड़ित अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई, फिक्स डिपॉजिट और यहां तक कि पुश्तैनी जेवर बेचकर ठगों के बैंक खातों में लाखों-करोड़ों रुपये ट्रांसफर कर देते हैं।
मानवाधिकार का हनन और NHRC का हस्तक्षेप
NHRC ने इस मामले को महज़ एक वित्तीय धोखाधड़ी नहीं, बल्कि ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन और मानसिक प्रताड़ना’ के रूप में देखा है। अपने ही घर में एक व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से बंधक बना लेना मानवाधिकारों का सबसे क्रूर उल्लंघन है। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि वर्तमान साइबर कानून इन हाई-टेक और मनोवैज्ञानिक अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए यह एक ‘वेक-अप कॉल’ है। पुलिस का पारंपरिक रवैया इस डिजिटल सिंडिकेट को नहीं रोक सकता। जब तक सरकार बैंकों की ‘नो-क्वेश्चन-आस्क्ड’ मनी ट्रांसफर नीतियों को सख्त नहीं करती और देश के हर नागरिक तक डिजिटल साक्षरता नहीं पहुंचाती, तब तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर आम आदमी अपनी गाढ़ी कमाई और मानसिक शांति दोनों लुटाता रहेगा।



