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‘बंटी हुई दुनिया को जोड़ने का भारतीय मंत्र’

G-7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी का दमदार संबोधन, फ्रांस के एवियन से दिया 'इंटर-कनेक्टेड वर्ल्ड' का कड़ा संदेश

विवेक ओझा/  एवियन (फ्रांस)/नई दिल्ली: जब दुनिया युद्धों, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक अनिश्चितताओं के भयंकर भंवर में फंसी हो, तब किसी एक देश का शीर्ष नेतृत्व किस तरह ‘ग्लोबल साउथ’ और विकासशील दुनिया की आवाज़ बन सकता है, यह आज फ्रांस के एवियन (Evian) शहर में देखने को मिला। 49वें जी-7 (G-7) शिखर सम्मेलन के एक बेहद अहम और हाई-प्रोफाइल सत्र में भाग लेते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “Forging New Partnerships and Rebuilding International Solidarity” (नई साझेदारियां बनाना और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण) विषय पर एक ऐसा सारगर्भित और कड़ा संबोधन दिया, जिसने विश्व के सात सबसे शक्तिशाली देशों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी मूल पाठ के अनुसार, प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों का आभार व्यक्त करते हुए की, लेकिन इसके तुरंत बाद उनका रुख वैश्विक चुनौतियों और पश्चिमी देशों की जवाबदेही की ओर मुड़ गया।

#### *’इंटर-कनेक्टेड’ दुनिया और पश्चिमी देशों को आइना*

अपने संबोधन के मूल (Core) हिस्से में पीएम मोदी ने स्पष्ट किया कि आज का विश्व पहले से कहीं अधिक ‘इंटर-कनेक्टेड’ (आपस में जुड़ा हुआ) और ‘इंटर-डिपेंडेंट’ (एक-दूसरे पर निर्भर) है। उन्होंने G-7 देशों के सामने इस कड़वी सच्चाई को रखा कि किसी भी एक देश या क्षेत्र में होने वाला भू-राजनीतिक तनाव या युद्ध, सीधे तौर पर हजारों किलोमीटर दूर बैठे देशों की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और खाद्य सुरक्षा (Food Security) को गंभीर खतरे में डाल देता है।

प्रधानमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में हाल ही में शांत हुए युद्ध और उससे पैदा हुए कच्चे तेल के संकट की ओर एक बड़ा इशारा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब दुनिया एक परिवार (वसुधैव कुटुम्बकम) की तरह जुड़ी है, तो चंद विकसित देशों की नीतियां ऐसी नहीं हो सकतीं जो विकासशील और गरीब देशों (ग्लोबल साउथ) को भुखमरी या ऊर्जा संकट के अंधेरे में धकेल दें।

‘अंतरराष्ट्रीय एकजुटता’ का भारतीय मॉडल

“Rebuilding International Solidarity” (अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का पुनर्निर्माण) के विषय पर बोलते हुए पीएम मोदी ने G-7 के मंच से भारत का मॉडल पेश किया। उन्होंने याद दिलाया कि जब दुनिया कोविड-19 महामारी और वैक्सीन के संकट से जूझ रही थी, तब यह भारत ही था जिसने सबसे पहले ‘वैक्सीन मैत्री’ के ज़रिए अपने दरवाजे गरीब देशों के लिए खोले थे।

उन्होंने G-7 देशों से अपील की (और एक तरह से कड़ा संदेश भी दिया) कि अंतरराष्ट्रीय एकजुटता का मतलब केवल अपने गुटों (Alliances) को मज़बूत करना नहीं है, बल्कि एक ऐसा पारदर्शी वैश्विक ढांचा तैयार करना है जहां सप्लाई चेन (Supply Chain) किसी एक देश (चीन की ओर परोक्ष इशारा) के एकाधिकार में न रहे। उन्होंने क्रिटिकल मिनरल्स (Critical Minerals) और सेमीकंडक्टर निर्माण में नई साझेदारियां बनाने पर जोर दिया, ताकि दुनिया में एक विश्वसनीय और लचीली (Resilient) अर्थव्यवस्था का निर्माण हो सके।

G-7 में भारत की ‘बार्गेनिंग पावर’

फ्रांस के एवियन में प्रधानमंत्री का यह संबोधन यह साबित करता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सिर्फ एक ‘श्रोता’ या ‘अतिथि’ नहीं है; वह अब वैश्विक एजेंडा सेट करने वाला एक प्रमुख ‘खिलाड़ी’ है।

G-7 (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा) मूल रूप से अमीर और विकसित देशों का एक ‘एक्सक्लूसिव क्लब’ है। लेकिन इन देशों को भी यह भली-भांति पता है कि भारत की 1.4 अरब आबादी, दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और इसके बढ़ते सैन्य व कूटनीतिक प्रभाव के बिना वे चीन के विस्तारवाद या जलवायु परिवर्तन जैसी किसी भी बड़ी चुनौती का सामना नहीं कर सकते।

पीएम मोदी का यह ‘मूल पाठ’ (Text) इस बात की स्पष्ट कूटनीतिक गवाही है कि भारत अपनी संप्रभुता और ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) से समझौता किए बिना ग्लोबल साउथ की सबसे बुलंद आवाज़ बन चुका है। एवियन का यह मंच इस बात का गवाह बना कि ‘नई साझेदारियां’ अब पश्चिमी देशों की शर्तों पर नहीं, बल्कि भारत की जरूरतों और समानता के आधार पर ही तय होंगी।

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