केजरीवाल की मेडिकल बेल पर सस्पेंस बरकरार: सुप्रीम कोर्ट ने लंबी बहस के बाद फैसला रखा सुरक्षित, कल आएगा अंतिम आदेश

पल्लवी श्रीवास्तव/ नई दिल्ली: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जेल से रिहाई होगी या उन्हें अभी तिहाड़ में ही रहना होगा, इस पर कानूनी और राजनीतिक सस्पेंस और गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट की अवकाशकालीन पीठ (Vacation Bench) ने मुख्यमंत्री की मेडिकल ग्राउंड (चिकित्सीय आधार) पर सात दिनों की अंतरिम जमानत बढ़ाने की याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट रूम में करीब तीन घंटे तक चली मैराथन और तीखी कानूनी बहस के बाद जस्टिस की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस मामले पर अंतिम आदेश कल यानी 25 जून को सुनाया जाएगा।
कोर्ट रूम का हाई-वोल्टेज ड्रामा: केजरीवाल पक्ष की दलीलें
अरविंद केजरीवाल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कोर्ट में उनके लगातार गिरते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए अंतरिम जमानत की पुरजोर मांग की। बचाव पक्ष ने कई मेडिकल रिपोर्ट्स को बेंच के सामने रखते हुए दलील दी कि जेल में रहने के दौरान मुख्यमंत्री का वजन अप्रत्याशित रूप से गिरा है, जो किसी गंभीर अंतर्निहित बीमारी (Underlying Disease) का प्रारंभिक संकेत हो सकता है।
बचाव पक्ष ने कोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से ये बिंदु रखे:
* कीटोन्स का बढ़ा स्तर: वकीलों ने यूरिन टेस्ट की रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि केजरीवाल के शरीर में कीटोन्स का स्तर काफी बढ़ गया है, जो गंभीर मधुमेह (Severe Diabetes) से पीड़ित मरीजों के लिए बेहद चिंताजनक और खतरनाक स्थिति है।
* विशेषज्ञ जांच की जरूरत: उनके पक्ष ने मांग की कि मुख्यमंत्री को केवल सात दिनों के लिए रिहा किया जाए ताकि वे दिल्ली के किसी विशेषज्ञ कार्डियोलॉजिस्ट और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से अपने पेट, लीवर और हृदय से संबंधित आवश्यक डायग्नोस्टिक टेस्ट (Diagnostic Tests) करवा सकें, क्योंकि तिहाड़ जेल के अस्पताल में ये अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
प्रवर्तन निदेशालय (ED) का कड़ा विरोध: ‘यह सिर्फ एक पैंतरा’
दूसरी तरफ, जांच एजेंसी (ED) की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने केजरीवाल की इस याचिका का पुरजोर विरोध किया और इसे जेल से बाहर आने का एक प्रशासनिक व कानूनी ‘पैंतरा’ करार दिया।
जांच एजेंसी ने कोर्ट के सामने जवाबी तर्क देते हुए कहा:
* जेल में इलाज संभव: ईडी ने दलील दी कि दिल्ली के मुख्यमंत्री एक वीआईपी कैदी हैं और तिहाड़ जेल प्रशासन उनकी सेहत का पूरा ख्याल रख रहा है। अगर उन्हें किसी विशेष जांच (Scans) की जरूरत भी है, तो कोर्ट के आदेश पर उन्हें दिल्ली एम्स (AIIMS) के डॉक्टरों की देखरेख में ले जाया जा सकता है; इसके लिए अंतरिम जमानत देने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है।
* पूर्व आचरण का हवाला: जांच एजेंसी ने कोर्ट को याद दिलाया कि इससे पहले भी जब केजरीवाल अंतरिम जमानत पर बाहर आए थे, तब वे राजनीतिक रैलियों और चुनाव प्रचार में पूरी तरह सक्रिय दिखे थे। ईडी के मुताबिक, उनके स्वास्थ्य संबंधी दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच का रुख और तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की वेकेशन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलों को बेहद गंभीरता से सुना और कुछ कड़े सवाल भी दागे। पीठ ने बचाव पक्ष से पूछा कि क्या निचली अदालत या एम्स के डॉक्टरों के पैनल ने अपनी किसी हालिया रिपोर्ट में यह साफ तौर पर लिखा है कि अरविंद केजरीवाल की स्थिति एक ‘मेडिकल इमरजेंसी’ (Medical Emergency) की श्रेणी में आती है? कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून देश के सभी नागरिकों के लिए समान है और केवल मुख्यमंत्री होने के नाते किसी को विशेष छूट नहीं दी जा सकती, जब तक कि स्वास्थ्य संबंधी कारण बेहद असाधारण न हों।
राजनीतिक और कानूनी मायने: अब आगे क्या?
कल आने वाला सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आम आदमी पार्टी (AAP) और दिल्ली सरकार के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक होने वाला है। दिल्ली में आगामी राजनीतिक घटनाक्रमों और सचिवालय के कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए केजरीवाल का जेल से बाहर आना पार्टी के लिए संजीवनी जैसा माना जा रहा है।
यदि कल शीर्ष अदालत उन्हें मेडिकल ग्राउंड पर सात दिनों की राहत दे देती है, तो यह पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी नैतिक और कानूनी जीत साबित होगी। इसके विपरीत, यदि याचिका खारिज होती है, तो मुख्यमंत्री को अपनी नियमित जमानत (Regular Bail) के लिए एक लंबी और थकाऊ कानूनी लड़ाई लड़नी होगी। फिलहाल, दिल्ली की सियासत की धड़कनें कल सुबह होने वाले इस फैसले पर टिकी हुई हैं।



