टीएमसी की बगावत में ‘मास्टरस्ट्रोक’: 20 बागी सांसदों ने स्पीकर को सौंपा संयुक्त जवाब, ‘दो-तिहाई बहुमत’ का दावा कर दल-बदल कानून को दी खुली चुनौती

राघवेंद्र प्रताप सिंह/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचे सियासी घमासान ने आज एक बेहद नाटकीय, कानूनी और निर्णायक मोड़ ले लिया है। टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी द्वारा 20 ‘बागी’ सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग पर पलटवार करते हुए, आज इन सभी बागी सांसदों ने अपना संयुक्त और आधिकारिक जवाब लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) को सौंप दिया है। इस जवाबी पत्र में बागी गुट ने जो दावा किया है, उसने न केवल टीएमसी आलाकमान बल्कि पूरे राष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।
बागी गुट ने संविधान के नियमों का हवाला देते हुए दावा किया है कि उनके पास पार्टी के कुल संसदीय दल का ‘दो-तिहाई’ (Two-thirds) से अधिक का स्पष्ट बहुमत है। इसलिए, उन पर दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) लागू ही नहीं होता और उनकी सदस्यता रद्द करने की अभिषेक बनर्जी की मांग पूरी तरह से असंवैधानिक और आधारहीन है।
संविधान की दसवीं अनुसूची बनी बागियों की ‘ढाल’
कानूनी और राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बागी सांसदों का यह कदम एक बहुत बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ है। भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule), जो दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित है, यह स्पष्ट प्रावधान करती है कि यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्य टूटकर अलग गुट बनाते हैं या किसी अन्य दल में विलय करते हैं, तो उनकी संसद या विधानसभा सदस्यता रद्द (Disqualify) नहीं की जा सकती।
वर्तमान लोकसभा में टीएमसी के कुल सांसदों की संख्या के गणित को देखा जाए, तो 20 सांसदों का यह एकजुट बागी गुट आसानी से उस ‘जादुई दो-तिहाई’ के आंकड़े को छू रहा है। बागियों ने अपने संयुक्त जवाब में लोकसभा अध्यक्ष से स्पष्ट कहा है कि वे पार्टी छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि बहुमत के आधार पर संसद के भीतर वही ‘असली टीएमसी’ (Real TMC) संसदीय दल का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जवाबी पत्र में टीएमसी नेतृत्व पर लगाए गंभीर आरोप
लोकसभा स्पीकर को सौंपे गए इस विस्तृत डोजियर (Dossier) में बागी सांसदों ने केवल कानूनी बचाव ही नहीं किया है, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व—विशेषकर अभिषेक बनर्जी—पर बेहद गंभीर और तीखे राजनीतिक हमले भी किए हैं। सूत्रों के मुताबिक, पत्र में मुख्य रूप से तीन बातें कही गई हैं:
1. आंतरिक लोकतंत्र की हत्या: बागी सांसदों ने आरोप लगाया है कि पार्टी में फैसले अब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं लिए जा रहे हैं। वरिष्ठ और जमीनी नेताओं को दरकिनार कर कुछ अनुभवहीन नेताओं द्वारा पार्टी चलाई जा रही है।
2. असहमति को ‘बगावत’ का नाम: सांसदों का कहना है कि उन्होंने संसद के भीतर जनता और राज्य के हित में कुछ मुद्दों पर पार्टी व्हिप से अलग राय रखी थी, जिसे आलाकमान ने मनमाने ढंग से अनुशासनहीनता और बगावत करार दे दिया।
3. ‘असली टीएमसी’ की मान्यता: बागी गुट ने स्पीकर से मांग की है कि चूंकि उनके पास बहुमत है, इसलिए सदन के भीतर उन्हें एक अलग और स्वतंत्र गुट (या असली टीएमसी) के रूप में मान्यता दी जाए।
ममता-अभिषेक बनर्जी के लिए बड़ा झटका
टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के लिए यह कदम एक बहुत बड़े ‘बैकफायर’ (Backfire) की तरह है। अभिषेक बनर्जी ने स्पीकर के पास जाकर यह सोचा था कि सदस्यता रद्द करने के डर से बागी सांसद दबाव में आकर झुक जाएंगे या टूट जाएंगे। लेकिन 20 सांसदों के अटूट और एकजुट रहने से पार्टी का दांव उसी पर भारी पड़ गया है। अब टीएमसी आलाकमान के सामने न केवल अपनी साख बचाने की चुनौती है, बल्कि संसद में अपनी पार्टी की आधिकारिक हैसियत (Official Status) को छिनने से रोकने का भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
अब आगे क्या? स्पीकर का विशेषाधिकार और ‘परेड’
अब इस पूरे राजनीतिक ड्रामे की चाबी पूरी तरह से लोकसभा अध्यक्ष के हाथों में आ गई है। संसदीय नियमों के तहत स्पीकर अब निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:
* दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की जांच: स्पीकर इस बात की कानूनी जांच करेंगे कि पत्र पर किए गए सभी 20 सांसदों के हस्ताक्षर असली हैं या नहीं और क्या उन्होंने यह फैसला बिना किसी दबाव के लिया है।
* सांसदों की फिजिकल परेड: बहुत संभव है कि स्पीकर अगले कुछ दिनों में इन सभी 20 बागी सांसदों को व्यक्तिगत रूप से अपने कक्ष में तलब करें (Physical Parade), ताकि बहुमत की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सके।



