विपक्षी एकता को बड़ा झटका
AAP का INDIA गठबंधन से किनारा, सांसद संजय सिंह ने कहा- "हम इस ब्लॉक का हिस्सा नहीं"

नई दिल्ली (पल्लवी श्रीवास्तव): भारतीय राजनीति में गठबंधन बनते और बिगड़ते देर नहीं लगती। दिल्ली में ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक की अहम महाबैठक शुरू होने से ठीक पहले विपक्षी एकता को एक करारा और अप्रत्याशित झटका लगा है। आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने एक बेहद चौंकाने वाला बयान देते हुए स्पष्ट कर दिया है कि उनकी पार्टी अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है। संजय सिंह का यह सीधा और दो-टूक बयान इस बात का साफ संकेत है कि आम आदमी पार्टी ने अब राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के इस साझा मोर्चे से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है और ‘एकला चलो’ की राह पकड़ ली है।
संजय सिंह का बयान: मजबूरी या सोची-समझी रणनीति?
संजय सिंह ने मीडिया से बातचीत करते हुए साफ तौर पर कहा कि, “हमारा गठबंधन लोकसभा चुनाव के लिए एक विशेष परिस्थिति में हुआ था। अब वे चुनाव खत्म हो चुके हैं। आम आदमी पार्टी एक स्वतंत्र राष्ट्रीय पार्टी है और हम इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं।” यह बयान अचानक नहीं आया है, बल्कि इसके पीछे दिल्ली और पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से पक रही खिचड़ी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आप (AAP) और कांग्रेस के बीच जमीनी स्तर पर कभी भी दिलों का मेल नहीं हो पाया था।
क्यों आई यह दरार? स्थानीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति
इस अलगाव का मुख्य कारण दिल्ली और पंजाब की स्थानीय राजनीति है। पंजाब में आम आदमी पार्टी सत्ता में है और कांग्रेस वहां मुख्य विपक्षी दल है। वहां दोनों दलों के नेता एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। इसी तरह, दिल्ली में भी कांग्रेस की प्रदेश इकाई लगातार अरविंद केजरीवाल और आप सरकार की नीतियों, विशेषकर जल संकट और भ्रष्टाचार के आरोपों पर हमलावर रही है।
जब गठबंधन हुआ था, तो स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसका भारी विरोध किया था। लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी 7 सीटों पर दोनों के मिलकर लड़ने के बावजूद कोई खास सफलता नहीं मिली, जिसने दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि यह गठबंधन ‘वोट ट्रांसफर’ कराने में विफल रहा है।
विपक्षी मोर्चे और आम आदमी पार्टी पर इसका असर
आम आदमी पार्टी का इंडिया ब्लॉक से बाहर जाना गठबंधन के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका है, क्योंकि AAP दो राज्यों (दिल्ली और पंजाब) में पूर्ण बहुमत की सरकार चला रही है और एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखती है। आप के अलग होने से यह धारणा मजबूत होती है कि विपक्ष बीजेपी के खिलाफ एक स्थायी और ठोस विकल्प देने में विफल हो रहा है।
वहीं, आम आदमी पार्टी के लिए यह फैसला भविष्य के विधानसभा चुनावों (जैसे दिल्ली और हरियाणा) में अपने दम पर अपनी सियासी जमीन बचाने की एक कवायद है। पार्टी आलाकमान, विशेषकर अरविंद केजरीवाल, यह अच्छी तरह जानते हैं कि अगर उन्हें अपनी ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ और ‘वैकल्पिक राजनीति’ की छवि को बचाए रखना है, तो उन्हें कांग्रेस की छाया से बाहर आना ही होगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि AAP के इस झटके के बाद इंडिया ब्लॉक के बाकी बचे दल अपने कुनबे को कैसे सहेजते हैं।



