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भारत के बाद अब पाकिस्तान में भी कॉकरोच पार्टी का हुआ जन्म

नई दिल्ली (राघवेंद्र प्रताप सिंह) : भारत के बाद अब पाकिस्तान में भी कॉकरोच पार्टी का जन्म हुआ है। सोशल मीडिया पर ” कॉकरोच पार्टी पाकिस्तान ” नाम का एक नया ग्रुप सामने आया है। यह ग्रुप भ्रष्टाचार, खराब गवर्नेंस और पाकिस्तान की बढ़ती आर्थिक चुनौतियों के खिलाफ आवाज उठा रहा है। इससे प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर की टेंशन बढ़ सकती है। इस ग्रुप का कहना है कि उसका एजेंडा आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता, अच्छी शिक्षा, देश के ऊर्जा संकट को हल करने और पानी की कमी को दूर करना है। इससे पहले भारत में कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन के कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने पड़ा और सरकार पेपर लीक को लेकर कड़ा कानून बनाने जा रही है।

कॉकरोच पार्टी पाकिस्तान के इंस्टाग्राम पर 112000 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। यह मूवमेंट “पाकिस्तान इसके लोगों का है, भ्रष्ट माफियाओं का नहीं” के नारे का इस्तेमाल कर रहा है। यह ग्रुप खुद को एकता और बदलाव के लिए युवाओं के जरिए चलाया जाने वाला कैंपेन बता रहा है। इंस्टाग्राम पर मौजूद जानकारी के अनुसार, यह अकाउंट मई में बनाया गया था और इसे कनाडा से ऑपरेट किया जा रहा है। इस ग्रुप को इस महीने की शुरुआत में वेरिफाई किया गया था। कॉकरोच पार्टी पाकिस्तान ने सलमान तरार को अपना चेयरमैन बताया है।

कॉकरोच पार्टी पाकिस्तान अपने कथित संगठन में अलग-अलग पदों के लिए आवेदन भी मंगा रही है। इससे अंदेशा जताया जा रहा है कि यह पार्टी जल्द ही ऑनलाइन मौजूदगी को जमीन पर उतारने की तैयारी में है। ऐसा माना जा रहा है कि कुछ महीनों के अंदर पाकिस्तान में या बाहर इस नाम से एक संगठनात्मक ढांचा खड़ा किया जा सकता है। हाल ही में जारी अपने घोषणापत्र में, ग्रुप का कहना है कि वह आम पाकिस्तानियों, खासकर युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जो भ्रष्टाचार, परिवारवाद की राजनीति और विशेषाधिकारों पर आधारित सिस्टम से परेशान हैं।

इस पार्टी ने इसने पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक सुधारों को बढ़ावा देने का वादा किया है। इसके साथ ही नौकरी के अवसर पैदा करने, शिक्षा, गवर्नेंस में सुधार और पाकिस्तान के ऊर्जा संकट के समाधान को प्राथमिकता दी है। हालांकि, सोशल मीडिया पर बढ़ती लोकप्रियता के बावजूद, इस मूवमेंट को असल में कितना जन-समर्थन हासिल है, इसकी संगठनात्मक ताकत क्या है और क्या यह ऑनलाइन जुड़ाव को एक असरदार राजनीतिक ताकत में बदल पाएगा, इस पर सवाल बने हुए हैं।

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