वीबी-जी राम जी योजना पर राज्यों की आपत्तियों का दावा, कांग्रेस ने केंद्र सरकार को घेरा

नई दिल्ली : कांग्रेस ने विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) गारंटी योजना (वीबी-जी राम जी) को लेकर कई राज्यों द्वारा नई योजना पर गंभीर आपत्तियां जताए जाने का दावा किया है। पार्टी के अनुसार, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों ने राज्यों पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ पर सवाल उठाए हैं। इसके अलावा कम से कम पांच राज्यों ने ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाने की मांग की है।
कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर कहा कि ग्रामीण विकास मंत्री के गृह राज्य की ओर से भी इस नई योजना को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने ग्रामीण विकास संबंधी संसदीय स्थायी समिति, राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों से पर्याप्त परामर्श किए बिना ही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को समाप्त करने संबंधी विधेयक संसद से पारित करा दिया।
जयराम रमेश ने कहा कि मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने नई व्यवस्था के तहत राज्यों पर पड़ने वाले अतिरिक्त वित्तीय बोझ को लेकर चिंता जताई है। कई राज्यों को आशंका है कि योजना के संचालन और वित्तपोषण में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ने से उनके बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि चार अन्य राज्य सरकारों ने खेती के चरम मौसम के दौरान प्रस्तावित ब्लैकआउट अवधि का विरोध किया है। इस अवधि में रोजगार उपलब्ध न होने से ग्रामीण श्रमिकों और किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। कम से कम पांच राज्यों ने ग्रामीण श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाने की मांग की है ताकि बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन की लागत के अनुरूप उन्हें पर्याप्त आय मिल सके।
उन्होंने कहा कि 01 जुलाई से मनरेगा के स्थान पर लागू की जा रही वीबी-जी राम जी योजना को लेकर राज्यों के बीच असंतोष बढ़ रहा है। मनरेगा ग्रामीण परिवारों को रोजगार की गारंटी प्रदान करती थी, जबकि नई योजना से राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ने और निर्णय प्रक्रिया के अधिक केंद्रीकृत होने की आशंका है।
जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने प्रतिशोध और राजनीतिक कारणों से प्रेरित होकर मनरेगा को समाप्त किया है। ग्रामीण रोजगार और आजीविका सुरक्षा से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव से पहले व्यापक चर्चा, संसदीय समीक्षा और राज्यों के साथ सहमति बनाना आवश्यक था।



