सेमीकंडक्टर संकट: पश्चिम एशिया युद्ध से भारत के “चिप ड्रीम” को झटका, सप्लाई चेन हुई बाधित

विवेक ओझा | नई दिल्ली: भारत को एक वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनाने के सरकार के महात्वाकांक्षी “चिप ड्रीम” (Chip Dream) को एक अप्रत्याशित और बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। पश्चिम एशिया (Middle East) में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह से प्रभावित हुई है। इसका सीधा और गहरा असर भारत में बन रहे नए सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन (Fab) और पैकेजिंग (OSAT) प्लांट्स के निर्माण और संचालन लागत पर पड़ रहा है।
अहम कच्चे माल की आपूर्ति पर संकट
चिप निर्माण कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है; इसके लिए कई अत्यंत विशिष्ट रसायनों और गैसों की आवश्यकता होती है। पश्चिम एशिया इन कच्चे मालों का एक प्रमुख केंद्र है। उदाहरण के लिए, चिप निर्माण में इस्तेमाल होने वाली कुल वैश्विक ‘हीलियम’ (Helium) गैस का एक-तिहाई हिस्सा कतर से आता है। इसी तरह, पैकेजिंग में काम आने वाले ‘ब्रोमीन’ (Bromine) का एक बड़ा हिस्सा इजराइल और जॉर्डन से आता है, जबकि चिप की सफाई में इस्तेमाल होने वाले सल्फर का अधिकांश व्यापार होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होकर गुजरता है। इस क्षेत्र में चल रहे युद्ध ने इन सभी रसायनों की आपूर्ति को रोक दिया है या बेहद महंगा कर दिया है।
परिवहन का बढ़ता खर्च और समय (Time Tax)
लाल सागर (Red Sea) क्षेत्र में हमलों के कारण कमर्शियल जहाजों को अब ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर एक लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है। इससे ट्रांजिट समय में 14 दिनों तक की वृद्धि हो गई है और माल ढुलाई की लागत (Freight Rates) आसमान छू रही है। जानकारों के अनुसार, कुछ भारतीय कंपनियां आपातकालीन उपाय के तौर पर इन रसायनों और कच्चे माल को एयरलिफ्ट (हवाई जहाज से परिवहन) कर रही हैं, लेकिन चिप मैन्युफैक्चरिंग जैसे बड़े स्केल के लिए यह नाकाफी है और इसकी लागत समुद्री रास्ते की तुलना में कई गुना अधिक है।
भारतीय प्रोजेक्ट्स पर असर
सप्लाई चेन के इस बड़े संकट के कारण भारत के प्रमुख सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स, विशेष रूप से गुजरात के धोलेरा में बन रहे ‘टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स’ के मेगा फैब प्लांट और माइक्रोन (Micron) व सीजी पावर जैसी कंपनियों के आउटसोर्स्ड असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) प्लांट्स के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। कच्चे माल और मशीनों की आवाजाही में देरी के कारण पायलट प्रोडक्शन की टाइमलाइन खिसकने का खतरा पैदा हो गया है, साथ ही ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने प्रोजेक्ट्स की पूंजीगत लागत (Capex) और परिचालन लागत (Opex) में भी भारी इजाफा कर दिया है।
आगे की राह
भारत सरकार ने हाल ही में ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) 2.0 की घोषणा की है, जिसका लक्ष्य न केवल कारखाने लगाना है, बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर सप्लाई चेन विकसित करना भी है। पश्चिम एशिया का यह संकट भारत के लिए एक बड़ा सबक है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि 2030 तक सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 100 अरब डॉलर से अधिक का बाजार बनने के अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए, भारत को अब फैब प्लांट्स के साथ-साथ इन क्रिटिकल कच्चे मालों के लिए भी स्थानीय ईकोसिस्टम (Local Ecosystem) विकसित करने पर तेजी से काम करना होगा, ताकि भविष्य में इस तरह के भू-राजनीतिक झटकों से बचा जा सके।



