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पोंडुरु खादी को मिला ‘GI टैग’: आंध्र प्रदेश के बुनकरों की मेहनत और गांधीजी की विरासत को मिली वैश्विक पहचान

अभिषेक सिंह | नई दिल्ली: आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के छोटे से गांव ‘पोंडुरु’ के बुनकरों के लिए आज का दिन एक ऐतिहासिक उपलब्धि लेकर आया है। अपनी बेहतरीन बुनावट और अद्वितीय गुणवत्ता के लिए देश-विदेश में मशहूर ‘पोंडुरु खादी’ (Ponduru Khadi) को भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI) टैग प्रदान किया गया है। यह फैसला इस क्षेत्र की समृद्ध हथकरघा विरासत को सहेजने की दिशा में एक मील का पत्थर है।

क्या है पोंडुरु खादी की खासियत?

पोंडुरु खादी को खादी के कपड़ों का ‘ताज’ कहा जाता है। इसे बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक और हस्तनिर्मित है। इसमें इस्तेमाल होने वाला सूत विशेष प्रकार के छोटे रेशे वाले कपास (हिल कॉटन और रेड कॉटन) से निकाला जाता है। यहां के बुनकर सूत कातने के लिए मछली के जबड़े की हड्डी और लकड़ी के विशेष उपकरणों का इस्तेमाल करते हैं, जो इसे बेहद मुलायम और टिकाऊ बनाता है।

महात्मा गांधी भी थे मुरीद

पोंडुरु खादी का इतिहास महात्मा गांधी से गहराई से जुड़ा हुआ है। 1921 में जब गांधीजी ने इस गांव का दौरा किया था, तो वे यहां के बुनकरों की कला और खादी की गुणवत्ता देखकर इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने पोंडुरु खादी को हमेशा के लिए अपना लिया। उन्होंने अपने लेखों में भी इस गांव की कताई कला की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।

GI टैग से क्या होगा फायदा?

GI टैग मिलने से अब पोंडुरु खादी को एक कानूनी संरक्षण मिल गया है। इसका मतलब है कि कोई भी अन्य व्यक्ति या कंपनी नकली कपड़े बनाकर उसे ‘पोंडुरु खादी’ के नाम से नहीं बेच सकेगी। इससे स्थानीय बुनकरों की आय में सीधा इजाफा होगा, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसकी ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी, और नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक और श्रमसाध्य कला को अपनाने के लिए प्रेरित होगी। यह GI टैग केवल एक कपड़े का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक अनमोल कला का सम्मान है।

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