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सियासी सरगर्मियों के बीच सीएम विजय का ‘आध्यात्मिक सहारा’

कर्नाटक के प्रसिद्ध कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर पहुंचे, राजनीतिक संकट से मुक्ति की प्रार्थना

पल्लवी श्रीवास्तव (कर्नाटक) / चेन्नई | तमिलनाडु की राजनीति में लगे ‘खरीद-फरोख्त’ (Horse Trading) के गंभीर आरोपों और चेन्नई से लेकर दिल्ली तक मचे भारी सियासी घमासान के बीच, मुख्यमंत्री और ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के प्रमुख जोसेफ विजय (Thalapathy Vijay) आज एक बेहद महत्वपूर्ण और गुप्त दौरे पर कर्नाटक पहुंचे हैं। द्रविड़ राजनीति में उठे इस नए बवंडर के बीच, सीएम विजय ने आज कर्नाटक के उडुपी जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध और ऐतिहासिक ‘कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर’ (Kollur Mookambika Temple) में माथा टेका। राजनीतिक गलियारों में इस दौरे को केवल एक सामान्य धार्मिक यात्रा नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे तमिलनाडु में उनके नेतृत्व पर लगे हालिया दागों और भविष्य की अभेद्य राजनीतिक बिसात से जोड़कर देखा जा रहा है।

कड़ी सुरक्षा के बीच कोल्लूर में ‘थलापति’ की विशेष पूजा
सुबह तड़के ही कर्नाटक पुलिस और तमिलनाडु के विशेष सुरक्षा दस्ते की भारी मौजूदगी के बीच मुख्यमंत्री विजय कोल्लूर मंदिर परिसर पहुंचे। पारंपरिक वस्त्रों में सजे सीएम विजय ने गर्भगृह में जाकर माँ मूकाम्बिका की विशेष ‘महामंगल आरती’ और गुप्त अनुष्ठान में हिस्सा लिया। मंदिर के मुख्य पुजारियों ने उन्हें अंगवस्त्र और विशेष प्रसाद भेंट किया।

आमतौर पर मीडिया और प्रशंसकों से घिरे रहने वाले विजय आज इस पूरे दौरे के दौरान बेहद शांत और विचारमग्न मुद्रा में नजर आए। उन्होंने मंदिर परिसर में मौजूद पत्रकारों के राजनीतिक सवालों पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी। मंदिर प्रशासन के सूत्रों के मुताबिक, यह पूजा विशेष रूप से ‘शत्रु बाधा निवारण’ और ‘मानसिक शांति’ के लिए कराई गई थी, जो यह साफ इशारा करती है कि चेन्नई में द्रमुक (DMK) द्वारा उन पर किए जा रहे चौतरफा हमलों से पैदा हुआ तनाव इस आध्यात्मिक शरण की मुख्य वजह है।

सियासी बिसात: आरोपों की तपिश और कोल्लूर का नाता
इस यात्रा का समय (Timing) बेहद संवेदनशील है। कल ही डीएमके प्रमुख एम.के. स्टालिन ने सीएम विजय पर मुख्य विपक्षी दल अन्नाद्रमुक (AIADMK) के विधायकों को तोड़ने और लोकतंत्र की हत्या करने का सीधा और आक्रामक आरोप लगाया था। इस ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ के विवाद के ठीक अगले ही दिन विजय का तमिलनाडु छोड़ना और कर्नाटक के इस विशिष्ट मंदिर में आना एक सोची-समझी रणनीतिक दूरी (Strategic Distance) भी हो सकती है।

दक्षिण भारत के राजनेताओं के लिए कोल्लूर मूकाम्बिका मंदिर हमेशा से संकटमोचक रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माँ मूकाम्बिका शक्ति, ज्ञान और विजय (जीत) की देवी हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक की राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर जब भी किसी बड़े कानूनी या राजनीतिक संकट में फंसते हैं, तो वे इस मंदिर की चौखट पर ज़रूर हाज़िर होते हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि विजय इस समय तमिलनाडु की राजनीति में ‘करो या मरो’ की स्थिति में हैं। एक तरफ उन्हें सरकार चलानी है, तो दूसरी तरफ द्रमुक और अन्नाद्रमुक के संयुक्त चक्रव्यूह को भी भेदना है। ऐसे में यह आध्यात्मिक आउटरीच उनके समर्थकों को यह संदेश देने की कोशिश है कि उनके नेता अडिग हैं।

‘द्रविड़ नास्तिकता’ बनाम ‘विजय का नया मॉडल’

अगर इस पूरी यात्रा को तमिलनाडु के सामाजिक-राजनीतिक चश्मे से देखा जाए, तो यह द्रविड़ राजनीति के मूल व्याकरण में एक बहुत बड़े बदलाव की गवाही देता है। तमिलनाडु की राजनीति दशकों तक पेरियार के ‘नास्तिकता’ और ‘ईश्वर-विरोध’ के सिद्धांतों पर चलती रही है, जहाँ द्रमुक (DMK) जैसी पार्टियां अक्सर खुद को धार्मिक प्रतीकों से दूर रखती आई हैं।

लेकिन, मुख्यमंत्री जोसेफ विजय अपनी राजनीति का एक बिल्कुल नया और अनूठा मॉडल पेश कर रहे हैं। वे एक तरफ ईसा मसीह के अनुयायी (जोसेफ) हैं, तो दूसरी तरफ वे हिंदू आस्था के सबसे बड़े केंद्रों पर जाकर पूरी श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं। उनका यह कदम सीधे तौर पर तमिलनाडु के उस ‘साइलेंट बहुसंख्यक’ (Silent Majority) वोटर बेस को साधने की कूटनीति है, जो द्रविड़ियन राजनीति की नास्तिकता से ऊब चुका है।

चेन्नई से दूर कर्नाटक की इस शांत वादियों में माँ मूकाम्बिका के चरणों में झुका विजय का यह सिर, दरअसल तमिलनाडु की जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश है कि उनका मुख्यमंत्री हर वर्ग की आस्था का सम्मान करता है। अब देखना यह होगा कि इस आध्यात्मिक ऊर्जा को साथ लेकर जब सीएम विजय वापस चेन्नई लौटते हैं, तो विपक्षी दलों द्वारा उनके खिलाफ रचे जा रहे राजनीतिक चक्रव्यूह का वे क्या और कैसा जवाब देते हैं।

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