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यूरोपीय संघ (EU) का गूगल (Google) पर बड़ा एक्शन

सर्च परिणामों में अपनी सेवाओं को अनुचित प्राथमिकता देने के आरोप में गूगल पर लगा भारी जुर्माना

राघवेंद्र प्रताप सिंह ब्रुसेल्स / नई दिल्ली: वैश्विक तकनीकी दिग्गज गूगल (Google) को यूरोपीय संघ (EU) के अविश्वास (Antitrust) नियामकों की ओर से एक और बड़े झटके का सामना करना पड़ा है। यूरोपीय आयोग ने गूगल पर अपनी बाजार में एकाधिकार (Monopoly) वाली स्थिति का दुरुपयोग करने का दोषी पाते हुए भारी-भरकम जुर्माना लगाया है। आयोग का आरोप है कि गूगल ने अपने ‘सर्च इंजन’ परिणामों में जानबूझकर अपनी खुद की सेवाओं (जैसे गूगल शॉपिंग और अन्य वर्टिकल्स) को प्रतिद्वंद्वी कंपनियों की तुलना में अनुचित तरीके से प्राथमिकता (Unfair Advantage) दी है।

क्या है यूरोपीय आयोग का आरोप?

यूरोपीय संघ की प्रतिस्पर्धा (Competition) वॉचडॉग की विस्तृत जांच में यह सामने आया कि जब उपभोक्ता गूगल पर किसी उत्पाद या सेवा को खोजते हैं, तो गूगल का एल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किया गया है कि वह अपनी सहयोगी सेवाओं के विज्ञापनों और लिंक्स को स्क्रीन के सबसे ऊपरी और आकर्षक हिस्से (Top of the Page) में दिखाता है। वहीं, अन्य स्वतंत्र और प्रतिस्पर्धी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स या प्राइस-कंपेरिजन वेबसाइट्स के लिंक्स को काफी नीचे धकेल दिया जाता है, जहां तक आमतौर पर कोई यूजर स्क्रॉल नहीं करता।

उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन

यूरोपीय आयोग की प्रमुख ने इस फैसले की घोषणा करते हुए कहा, “गूगल का यह कृत्य न केवल अन्य कंपनियों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा (Fair Competition) से वंचित करता है, बल्कि यह उपभोक्ताओं के लिए भी नुकसानदेह है, क्योंकि उन्हें सर्वोत्तम विकल्प या कीमतें देखने को नहीं मिलतीं।” आयोग ने गूगल को अपने सर्च एल्गोरिदम में 90 दिनों के भीतर बदलाव कर ‘समान अवसर’ (Level Playing Field) सुनिश्चित करने का कड़ा अल्टीमेटम दिया है, अन्यथा उस पर प्रतिदिन के हिसाब से अतिरिक्त पेनाल्टी लगाई जाएगी।

तकनीकी जगत (Big Tech) पर कसता शिकंजा

यह पहली बार नहीं है जब गूगल को यूरोपीय संघ के कड़े कानूनों का सामना करना पड़ा है। इससे पहले भी एंड्रॉइड (Android) ऑपरेटिंग सिस्टम और ऐडसेंस (AdSense) से जुड़े अविश्वास मामलों में कंपनी अरबों यूरो का जुर्माना भर चुकी है। इस हालिया फैसले का असर केवल यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत सहित दुनिया भर के प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commissions) भी इस फैसले का अध्ययन कर गूगल की ‘प्रायोरिटाइजेशन’ नीतियों पर अपना शिकंजा और कड़ा कर सकते हैं।

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