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कोयला खदानों से मिलेगा शुद्ध पेयजल

कोयला मंत्रालय की 'कोल नीर' (Coal NEER) पहल का उद्घाटन, खदानों के पानी को साफ कर ग्रामीणों तक पहुंचाया जाएगा

विवेक ओझा/ नई दिल्ली / रांची: जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने आज अपनी बहुप्रतीक्षित ‘कोल नीर’ (Coal NEER) पहल का आधिकारिक उद्घाटन कर दिया है। इस अनोखी परियोजना का मुख्य उद्देश्य कोयला खदानों (Coal Mines) से निकलने वाले अनुपयोगी और प्रदूषित पानी को अत्याधुनिक रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और फिल्टरेशन प्लांट के जरिए साफ कर उसे पीने योग्य बनाना है। इसके बाद यह शुद्ध जल खदानों के आसपास के ग्रामीण इलाकों में सप्लाई किया जाएगा।

कैसे काम करेगी यह तकनीक?

कोयला खनन के दौरान खदानों में बड़ी मात्रा में भूजल रिसकर जमा हो जाता है, जिसे बाहर निकालना पड़ता है। अब तक यह पानी बेकार बह जाता था या आसपास के जलस्रोतों को दूषित करता था। ‘कोल नीर’ परियोजना के तहत, कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) ने खदानों के पास ही भारी-भरकम वाटर ट्रीटमेंट प्लांट (Water Treatment Plants) लगाए हैं। यहां पानी से कोयले के कण, भारी धातुएं (Heavy Metals) और अन्य अशुद्धियां निकाली जाएंगी। शोधित होने के बाद यह पानी पूरी तरह से बीआईएस (BIS) के पेयजल मानकों के अनुरूप होगा।

झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश को सीधा लाभ

इस परियोजना का सबसे अधिक लाभ उन जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों को मिलेगा जहां गर्मियों के दौरान पीने के पानी का भारी संकट रहता है। पहले चरण में झारखंड (झरिया और बोकारो), छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कोयला क्षेत्रों में इसे लागू किया जा रहा है। शोधित जल को विशेष पाइपलाइनों के जरिए गांवों तक पहुंचाया जाएगा, जबकि बचे हुए अतिरिक्त पानी का उपयोग खेतों की सिंचाई (Irrigation) के लिए किया जाएगा।

यह पहल ‘सर्कुलर इकॉनमी’ (Circular Economy) का एक बेहतरीन उदाहरण है, जहां खनन के कचरे (Waste Water) को एक जीवन रक्षक संसाधन (Life-saving Resource) में बदला जा रहा है। सरकार का लक्ष्य आगामी तीन वर्षों में ऐसे 100 से अधिक ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करना है, जो खनन क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों की प्यास बुझाएंगे।

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