अमेरिकी टैरिफ का करारा जवाब
भारत ने ब्रिक्स (BRICS) देशों में तलाशे नए बाजार, भारतीय जेनेरिक दवाओं के लिए 3.5 गुना बड़ा बाजार तैयार

विवेक ओझा/ नई दिल्ली: अमेरिका में नए राष्ट्रपति प्रशासन द्वारा विदेशी जेनेरिक दवाओं पर लगाए गए भारी-भरकम आयात शुल्क (Tariffs) का सामना करने के लिए भारतीय फार्मास्युटिकल सेक्टर ने एक बेहद आक्रामक और सफल कूटनीतिक-आर्थिक रणनीति अपनाई है। अमेरिका पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए, भारत सरकार और फार्मा निर्यातकों ने ब्रिक्स (BRICS) देशों और ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) में नए बाजारों को तेजी से एक्सप्लोर किया है। वाणिज्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अपनी जेनेरिक दवाओं के लिए अमेरिकी बाजार के नुकसान की भरपाई करते हुए एक ऐसा वैकल्पिक बाजार तैयार कर लिया है जो आकार में 3.5 गुना बड़ा है।
ब्रिक्स देशों में भारतीय दवाओं की बढ़ती मांग
अमेरिका द्वारा लगाए गए टैरिफ के बाद, भारतीय वाणिज्य मंत्रालय ने एक विशेष ‘टास्क फोर्स’ का गठन किया था जिसका उद्देश्य नए बाजारों में व्यापारिक बाधाओं को दूर करना था। रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और हाल ही में ब्रिक्स में शामिल हुए ईरान और मिस्र (Egypt) जैसे देशों ने भारतीय जेनेरिक दवाओं और जीवन रक्षक टीकों (Vaccines) के लिए अपनी नियामक प्रक्रियाओं (Regulatory Approvals) को बेहद सरल कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, इन देशों में भारतीय फार्मा निर्यात में पिछले छह महीनों में रिकॉर्ड उछाल दर्ज किया गया है।
अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बढ़ता दबदबा
अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के विपरीत, भारत ‘विश्व की फार्मेसी’ (Pharmacy of the World) की अपनी छवि को और मजबूत कर रहा है। भारत ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई विकासशील देशों के साथ ‘स्थानीय मुद्रा’ (Local Currency) में व्यापारिक समझौते किए हैं। इससे न केवल इन देशों को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली दवाइयां डॉलर की किल्लत के बिना मिल रही हैं, बल्कि भारतीय कंपनियों का मुनाफा भी बढ़ा है।
आर्थिक जानकारों का क्या कहना है?
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत का यह कदम वैश्विक व्यापार की दिशा में एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ (Masterstroke) है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के अनुसार, “यह संकट भारतीय फार्मा उद्योग के लिए एक अवसर बनकर उभरा है। अब हम एक बाजार पर निर्भर नहीं हैं। हमारी जेनेरिक दवाएं गुणवत्ता में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं, और यदि अमेरिका संरक्षणवाद (Protectionism) अपनाता है, तो बाकी दुनिया भारतीय दवाओं का खुले हाथों से स्वागत कर रही है।” यह रणनीति भारत के फार्मा सेक्टर को भविष्य के किसी भी ‘ट्रेड शॉक’ से बचाने में अहम भूमिका निभाएगी।



