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प्रशांत महासागर के देश नौरू ने बदला अपना नाम

अब 'रिपब्लिक ऑफ नाओरो' (Naoero) के नाम से जाना जाएगा, नया कंट्री कोड NRO

विवेक ओझा/ यारेन / सुवा: प्रशांत महासागर के मध्य में स्थित दुनिया के तीसरे सबसे छोटे संप्रभु देश (Sovereign State), नौरू (Nauru), ने अपनी सांस्कृतिक और स्वदेशी पहचान (Indigenous identity) को पुनर्जीवित करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश के राष्ट्रपति डेविड अदेआंग (David Adeang) ने आधिकारिक रूप से घोषणा की है कि उनके देश ने ‘नौरू’ नाम त्यागकर अब अपना स्वदेशी नाम ‘रिपब्लिक ऑफ नाओरो’ (Republic of Naoero) अपना लिया है।

इस ऐतिहासिक नाम परिवर्तन की प्रक्रिया मई 2026 में देश की संसद द्वारा पारित एक संवैधानिक संशोधन (Constitutional Amendment) के माध्यम से पूरी की गई। इसके बाद, 26 जून 2026 को संयुक्त राष्ट्र (United Nations) को इस बदलाव की औपचारिक अधिसूचना भेज दी गई थी, जिसने अब आधिकारिक रिकॉर्ड को अपडेट करना शुरू कर दिया है। नए बदलावों के तहत, देश का संक्षिप्त नाम अब ‘नाओरो’ (Naoero) होगा, इसका अंतरराष्ट्रीय कंट्री कोड बदलकर ‘NRO’ कर दिया गया है, और देश के नागरिकों को अब ‘देई-नाओरो’ (dei-Naoero) के नाम से जाना जाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने पहले इस नाम परिवर्तन के लिए एक राष्ट्रीय जनमत संग्रह (National Referendum) कराने की योजना बनाई थी। लेकिन 31 जुलाई को राष्ट्रपति अदेआंग ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए स्पष्ट किया कि जनमत संग्रह का विचार रद्द कर दिया गया है। उन्होंने कहा, “विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि ‘नाओरो’ कोई नया नाम नहीं है जिसे जनता की स्वीकृति की आवश्यकता हो। यह लोगों की पहले से ही पहचान है, यह हमारे राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह (Coat of Arms) पर मौजूद है और हमारे संविधान द्वारा अनुमत है”।

विशेषज्ञों का कहना है कि ‘नौरू’ नाम औपनिवेशिक काल (Colonial era) की देन था, जिसने द्वीप के मूल नाम को बदल दिया था। इस नाम वापसी को ‘नाओरो’ भाषा (dorerin Naoero) के संरक्षण के एक बड़े प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। यूनेस्को (UNESCO) ने नाओरो भाषा को “गंभीर रूप से लुप्तप्राय” (Severely endangered) श्रेणी में रखा है।

लगभग 12,000 की आबादी और मात्र 21 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस देश के पास कोई आधिकारिक राजधानी नहीं है, हालांकि इसके सरकारी कार्यालय यारेन (Yaren) जिले में स्थित हैं। नाम बदलने के इस फैसले का स्थानीय लोगों ने अपनी ऐतिहासिक जड़ों की ओर लौटने के एक गर्वपूर्ण क्षण के रूप में स्वागत किया है। यह प्रशांत क्षेत्र में स्वदेशी पहचान और डी-कोलोनाइजेशन (De-colonization) की दिशा में एक बड़ा वैचारिक कदम माना जा रहा है।

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