मध्य-पूर्व शांति की दिशा में बड़ा कदम
लेबनान और इजरायल के बीच रोम में सीधे वार्ता का नया दौर शुरू, हिजबुल्लाह ने किया कड़ा विरोध
सरिता त्रिपाठी/ रोम / यरूशलेम: मध्य-पूर्व (Middle East) में लंबे समय से चले आ रहे सैन्य तनाव को कूटनीतिक रूप से हल करने की दिशा में एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। अमेरिका (USA) की मध्यस्थता में लेबनान और इजरायल के बीच मंगलवार को इटली की राजधानी रोम में सीधे बातचीत का एक नया दौर शुरू हो गया है। इस वार्ता का मुख्य उद्देश्य दक्षिणी लेबनान में एक स्थायी सुरक्षा ढांचा (Security Framework) स्थापित करना और दोनों देशों के बीच सीमा विवादों को हल करना है।
मंगलवार की सुबह लेबनानी और इजरायली प्रतिनिधिमंडलों के काफिले रोम स्थित अमेरिकी दूतावास पहुंचे। इजरायली प्रतिनिधिमंडल में इजरायल रक्षा बलों (IDF) के शीर्ष अधिकारी भी शामिल हैं। अमेरिकी प्रायोजित यह बातचीत पिछले कई महीनों से जारी कूटनीतिक प्रयासों का सातवां दौर है। जून में वाशिंगटन में हुई पिछली बैठक में दोनों पक्षों ने एक ‘फ्रेमवर्क डील’ पर सहमति जताई थी। इस डील के तहत दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की चरणबद्ध वापसी (Phased withdrawal) और उन क्षेत्रों में लेबनानी सशस्त्र बलों (LAF) की तैनाती शामिल है।
रोम में चल रही इस वर्तमान वार्ता का मुख्य फोकस ‘पायलट जोन’ (Pilot Zones) के विस्तार पर है। इन पायलट क्षेत्रों में लेबनानी सेना (LAF) सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी अपने हाथों में लेगी, और अन्य सभी गैर-राज्य अभिनेताओं (विशेष रूप से हिजबुल्लाह) को वहां से बाहर किया जाएगा। इजरायल का लक्ष्य इस वार्ता के जरिए हिजबुल्लाह का पूर्ण निरस्त्रीकरण (Disarmament) और लेबनान में ईरानी फंडिंग के प्रवाह को रोकना भी है।
हालांकि, इस ऐतिहासिक कूटनीतिक प्रगति का लेबनान में ही कड़ा विरोध हो रहा है। ईरान समर्थित आतंकी समूह हिजबुल्लाह (Hezbollah) के उप नेता नईम कासिम ने इन सीधी वार्ताओं की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इस बातचीत को लेबनान के लिए “शर्मनाक, अपमानजनक और लगातार समझौतों का एक सिलसिला” (Humiliation) करार दिया है। हिजबुल्लाह का तर्क है कि इजरायल के साथ इस तरह का कोई भी समझौता फिलिस्तीन और प्रतिरोध गुटों के साथ धोखा है।
लेबनानी सरकार के मंत्रियों ने हिजबुल्लाह के इन आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा है कि बिना राज्य की सहमति के देश को एक ‘व्यर्थ युद्ध’ (Futile war) में धकेलने वालों को देश की संप्रभुता पर बात करने का कोई अधिकार नहीं है। अमेरिका ने स्पष्ट किया है कि यह वार्ता बहुत नाजुक है और इसमें जल्दबाजी करने से नागरिकों की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या रोम वार्ता मध्य-पूर्व में स्थायी शांति का एक नया अध्याय लिख पाएगी।
