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अमेरिकी टैरिफ और यूके ट्रेड डील के खिलाफ बड़ा आंदोलन

ट्रेड यूनियनों और किसानों ने 13 अगस्त को किया राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान

इंडियन व्यू टीम/ नई दिल्ली: देश की अर्थव्यवस्था, संप्रभुता और स्थानीय व्यापार को विदेशी हस्तक्षेप से बचाने के लिए भारत के किसानों और श्रमिकों ने एक बड़े जन-आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा (Samyukt Kisan Morcha – SKM) और देश के दस प्रमुख केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (CTUs) के संयुक्त मंच ने 13 अगस्त 2026 को एक ‘राष्ट्रव्यापी प्रतिरोध दिवस’ (Nationwide Day of Resistance) और विशाल विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणा की है।

यह विशाल प्रदर्शन मुख्य रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक टैरिफ (Tariffs) लगाने की धमकी और हाल ही में हस्ताक्षरित ‘भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते’ (India-UK CETA) के खिलाफ आयोजित किया जा रहा है। ट्रेड यूनियनों और किसानों का आरोप है कि अमेरिका अपनी व्यापारिक नीतियों के माध्यम से भारत की संप्रभुता को चुनौती दे रहा है और रूस के साथ भारत के स्वतंत्र तेल व्यापार (Oil Trade) को रोकने के लिए ‘आर्थिक जबरदस्ती’ (Economic Coercion) कर रहा है।

संयुक्त बयान में सीटीयू-एसकेएम (CTUs-SKM) मंच ने कहा कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम उन विकासशील देशों को डराने का प्रयास है जो अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हैं। इसके साथ ही, मंच ने भारत-यूके (India-UK) व्यापार समझौते (CETA) को देश के कृषि और सेवा क्षेत्र के लिए विनाशकारी बताया है। उनका तर्क है कि इस समझौते से विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय बाजार में सस्ते डेयरी उत्पादों, गेहूं और मांस को पाटने (Dumping) की अनुमति मिल जाएगी, जिससे देश के छोटे किसानों की आजीविका पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने आरोप लगाया कि इस डील से भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र (Healthcare sector) का कॉर्पोरेटाइजेशन होगा और आवश्यक दवाओं की कीमतें आसमान छूने लगेंगी।

इस राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन के तहत 13 अगस्त को देश के सभी प्रमुख शहरों, जिला मुख्यालयों और ग्रामीण इलाकों में विशाल ट्रैक्टर और मोटरसाइकिल रैलियां, धरना-प्रदर्शन और सार्वजनिक सभाएं आयोजित की जाएंगी। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें हैं—ट्रंप की टैरिफ धमकियों को सिरे से खारिज करना, भारत-यूके समझौते को संसद की मंजूरी के बिना लागू होने से रोकना, और अमेरिका के साथ चल रही किसी भी गुप्त व्यापार वार्ता को तुरंत सार्वजनिक करना।

नेताओं ने इस स्थिति की तुलना औपनिवेशिक काल (Colonial period) की ईस्ट इंडिया कंपनी से करते हुए कहा है कि विदेशी व्यापार संधियां ‘कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद’ (Corporate Imperialism) का नया हथियार बन गई हैं। इस आंदोलन से केंद्र सरकार पर अपनी व्यापारिक और कूटनीतिक रणनीतियों को लेकर भारी घरेलू दबाव बढ़ने की संभावना है।

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