भारतीय राजनीति का कड़वा सच: देश के 45% मुख्यमंत्रियों पर लंबित हैं आपराधिक मामले, ADR की ताज़ा रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल

पल्लवी श्रीवास्तव
नई दिल्ली
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी राजनीति और जन प्रतिनिधियों के आपराधिक रिकॉर्ड को लेकर एक बार फिर बेहद चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और ‘द हिंदू’ के विश्लेषणात्मक अध्ययन के अनुसार, भारत के वर्तमान मुख्यमंत्रियों में से लगभग 45 प्रतिशत मुख्यमंत्रियों ने अपने चुनावी हलफनामों में स्वयं पर आपराधिक मामले (Criminal Cases) लंबित होने की घोषणा की है। इनमें से कई मामले गंभीर वित्तीय अनियमितताओं, चुनावी धांधली और हिंसक प्रदर्शनों से जुड़े हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा चुनाव आयोग को सौंपे गए स्व-घोषित शपथपत्रों के विश्लेषण से यह बात साफ होती है कि दलगत राजनीति से परे लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं पर मुकदमे दर्ज हैं। जहां कुछ नेताओं का दावा है कि ये मामले राजनीतिक द्वेष भावना और जन आंदोलनों के दौरान दर्ज किए गए हैं, वहीं चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति के अपराधीकरण (Criminalisation of Politics) पर रोक लगाने में न्यायपालिका और चुनाव आयोग के कड़े दिशा-निर्देश भी पूरी तरह से कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं।
इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद सिविल सोसाइटी और चुनाव सुधार के लिए काम करने वाले संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमों के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतों (Fast-track Courts) की प्रक्रिया को और तेज़ किया जाए। नागरिक संस्थाओं का तर्क है कि जब तक गंभीर आरोपों से घिरे प्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कड़े कानून नहीं बनेंगे, तब तक सुशासन और शुचिता का दावा अधूरा ही रहेगा।



