अंतरिक्ष की दुनिया में भारत की एक और छलांग: इसरो (ISRO) ने रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) का अहम परीक्षण किया सफल

अभिषेक सिंह/ बेंगलुरु: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष अन्वेषण (Space Exploration) और उपग्रह प्रक्षेपण के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और लागत-प्रभावशीलता की दिशा में एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर पार कर लिया है। इसरो ने अपने महत्वाकांक्षी ‘पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान’ (Reusable Launch Vehicle – RLV) के एक और बेहद महत्वपूर्ण घटक का सफल परीक्षण पूरा कर लिया है। यह स्वदेशी तकनीक भारत को उन गिने-चुने देशों की कतार में ला खड़ा करेगी, जिनके पास अंतरिक्ष में रॉकेट भेजकर उसे विमान की तरह वापस धरती पर उतारने की क्षमता है।
क्या है RLV तकनीक और इसका महत्व?
वर्तमान में, अधिकांश अंतरिक्ष मिशनों में उपयोग किए जाने वाले रॉकेट (जैसे PSLV या GSLV) एक बार इस्तेमाल होने के बाद नष्ट हो जाते हैं या समुद्र में गिर जाते हैं। इससे अंतरिक्ष मिशन की लागत बहुत अधिक हो जाती है। ‘रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल’ (RLV) एक स्पेस शटल (Space Shuttle) की तरह काम करता है। यह उपग्रहों को उनकी कक्षा में स्थापित करने के बाद एक हवाई जहाज की तरह वापस पृथ्वी पर रनवे पर सुरक्षित लैंड कर सकता है।
इस सफल परीक्षण के मुख्य बिंदु:
* सटीक नेविगेशन और लैंडिंग: इसरो ने चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में यान की स्वायत्त लैंडिंग (Autonomous Landing) क्षमता को परखा। यान ने तेज हवाओं और उच्च गति के बावजूद नेविगेशन, नियंत्रण प्रणाली और एयरोडायनामिक्स का बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए एकदम सटीक लैंडिंग की।
* लागत में भारी कमी: इस तकनीक के पूरी तरह से विकसित होने के बाद, अंतरिक्ष में पेलोड (Payload) भेजने की लागत मौजूदा कीमत की तुलना में 80 प्रतिशत तक कम हो जाएगी।
* स्वदेशी तकनीक: यान के थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम, हीट शील्ड और लैंडिंग गियर पूरी तरह से भारत में विकसित किए गए हैं।
इसरो का यह मिशन भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशनों के निर्माण, डीप स्पेस एक्सप्लोरेशन और कम लागत वाले वाणिज्यिक उपग्रह प्रक्षेपण (Commercial Satellite Launch) के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। यह सफलता ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन को अंतरिक्ष की अनंत ऊंचाइयों तक ले जा रही है।



