लखनऊ अग्निकांड पर हाई कोर्ट का कड़ा प्रहार
हादसे का लिया स्वतः संज्ञान, यूपी सरकार को प्रदेशभर के कोचिंग सेंटरों के 'फायर सेफ्टी ऑडिट' का सख्त आदेश

राघवेंद्र प्रताप सिंह / लखनऊ : लखनऊ के अलीगंज (पुरनिया) इलाके में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने पूरे प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था और शहरी नियोजन (Urban Planning) की पोल खोल कर रख दी है। 15 युवा छात्रों की मौत के इस हृदयविदारक हादसे के बाद अब न्यायपालिका ने इस मामले में बेहद कड़ा और निर्णायक हस्तक्षेप किया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने आज इस त्रासदी का स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) और अग्निशमन विभाग (Fire Department) को कड़ी फटकार लगाई है।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि मासूम बच्चों की जान से इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही, बेंच ने प्रदेश सरकार को पूरे उत्तर प्रदेश की सभी व्यावसायिक इमारतों (Commercial Buildings) और कोचिंग सेंटरों का तत्काल ‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ (Fire Safety Audit) करने का ऐतिहासिक और सख्त आदेश जारी किया है।
हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: ‘यह हादसा नहीं, सिस्टम की नाकामी है’
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की दो जजों की बेंच का लहजा बेहद तल्ख रहा। अदालत ने समाचार पत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स का संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार के वकीलों से तीखे सवाल पूछे। बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा, “बिना ‘फायर एनओसी’ (Fire NOC) और आपातकालीन निकास (Emergency Exit) के एक आवासीय इमारत में इतना बड़ा कोचिंग सेंटर कैसे चल रहा था? यह कोई सामान्य दुर्घटना नहीं है, बल्कि सिस्टम के भ्रष्टाचार और अधिकारियों की घोर लापरवाही के कारण हुई हत्याओं के समान है।”
अदालत ने कहा कि जब तक कोई बड़ी त्रासदी नहीं हो जाती, तब तक प्रशासन कुंभकर्णी नींद सोता रहता है और बाद में जांच कमेटियां बनाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है।
‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ को लेकर कोर्ट के कड़े निर्देश
भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक विस्तृत और समयबद्ध कार्ययोजना सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट के आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
* तत्काल ऑडिट अभियान: प्रदेश के सभी 75 जिलों के जिलाधिकारियों (DMs) और मुख्य अग्निशमन अधिकारियों (CFOs) के नेतृत्व में एक संयुक्त टास्क फोर्स बनाई जाए। यह टीम अगले एक महीने के भीतर सभी कोचिंग सेंटरों, बहुमंजिला व्यावसायिक इमारतों, अस्पतालों और गेमिंग जोन्स का सघन ‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ करेगी।
* अवैध इमारतों को सील करने का आदेश: जांच के दौरान जो भी इमारतें अग्नि सुरक्षा मानकों (National Building Code) का पालन करती हुई नहीं पाई जाएं, या जिनके पास वैध फायर NOC न हो, उन्हें बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के तुरंत सील किया जाए।
* बेसमेंट में कोचिंग पर रोक: अदालत ने विशेष रूप से निर्देश दिया है कि बेसमेंट या संकरी गलियों में चल रही उन सभी कमर्शियल गतिविधियों को तुरंत रोका जाए, जहां हवा के आवागमन (Ventilation) और आपात स्थिति में बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता मौजूद न हो।
‘केवल छोटी मछलियों पर कार्रवाई से काम नहीं चलेगा’
लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा इस मामले में 3 जूनियर इंजीनियरों (JEs) को निलंबित किए जाने की कार्रवाई को हाई कोर्ट ने महज एक ‘दिखावा’ (Eyewash) करार दिया। अदालत ने कहा कि इतनी बड़ी अवैध कमर्शियल बिल्डिंग का निर्माण और संचालन केवल निचले स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत से संभव नहीं है।
बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इस मामले में उन वरिष्ठ अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जाए, जिनके कार्यकाल में इस इमारत का अवैध व्यावसायिक उपयोग शुरू हुआ और जिन्होंने समय रहते इसे सील करने की कार्रवाई नहीं की।
व्यवस्था के लिए ‘वेक-अप कॉल’
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह स्वतः संज्ञान और ‘फायर सेफ्टी ऑडिट’ का आदेश प्रदेश की सोती हुई अफसरशाही के लिए एक बहुत बड़ा ‘वेक-अप कॉल’ है। आज के समय में हर छोटे-बड़े शहर में तंग गलियों और असुरक्षित इमारतों के भीतर ‘शिक्षा की दुकानें’ यानी कोचिंग सेंटर धड़ल्ले से चल रहे हैं। इनमें पढ़ने वाले हजारों छात्रों की जिंदगी हमेशा बारूद के ढेर पर बैठी रहती है।
न्यायपालिका का यह कड़ा रुख उन परिवारों के लिए न्याय की एक उम्मीद है, जिन्होंने अलीगंज हादसे में अपने बच्चों को खोया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार हाई कोर्ट के इस आदेश का कितनी सख्ती और ईमानदारी से पालन करती है, क्योंकि कागजी रिपोर्टों से इतर असली बदलाव धरातल पर ही दिखना चाहिए। प्रशासन को यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार की कीमत किसी भी आम नागरिक की जान से ज्यादा नहीं हो सकती।



