सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
निजता के अधिकार को मिली नई ताकत, व्यक्तिगत डेटा के व्यावसायिक उपयोग पर कड़े दिशा-निर्देश

नई दिल्ली (लीगल एवं नेशनल डेस्क): डिजिटल युग में आम नागरिक के डेटा की सुरक्षा को लेकर आज भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले ‘निजता के अधिकार’ (Right to Privacy) को और अधिक मजबूत करते हुए बड़ी टेक कंपनियों और कॉर्पोरेट घरानों द्वारा लोगों के ‘व्यक्तिगत डेटा के व्यावसायिक उपयोग’ (Commercial Use of Personal Data) पर बेहद कड़े और नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि आम नागरिक का डेटा कोई ‘बिकाऊ संपत्ति’ नहीं है जिसे कंपनियां बिना अनुमति के अपने मुनाफे के लिए इस्तेमाल कर सकें।
‘स्पष्ट सहमति’ (Explicit Consent) के बिना डेटा का उपयोग गैरकानूनी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 500 पन्नों के विस्तृत फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी सोशल मीडिया कंपनी, ई-कॉमर्स वेबसाइट, या बैंक अपने उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डेटा (जैसे सर्च हिस्ट्री, लोकेशन, खरीदारी का पैटर्न और वित्तीय जानकारी) को बिना उनकी ‘स्पष्ट और सूचित सहमति’ (Explicit and Informed Consent) के किसी भी थर्ड पार्टी या विज्ञापनदाता (Advertiser) को नहीं बेच सकता। कोर्ट ने कहा कि कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ‘नियम और शर्तें’ (Terms & Conditions) के लंबे और जटिल पन्ने आम आदमी को गुमराह करने वाले होते हैं। अब कंपनियों को स्थानीय भाषाओं में एक लाइन में स्पष्ट बताना होगा कि वे किस डेटा का उपयोग कर रही हैं और क्यों कर रही हैं।
‘डार्क पैटर्न्स’ (Dark Patterns) पर पूर्ण प्रतिबंध
कोर्ट ने अपने फैसले में ‘डार्क पैटर्न्स’ (तकनीकी हथकंडे जिनसे यूजर्स को अनजाने में डेटा शेयर करने के लिए मजबूर किया जाता है) के इस्तेमाल पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई कंपनी किसी सर्विस के लिए ऐसा डेटा मांगती है जो उस सर्विस के लिए जरूरी नहीं है (जैसे टॉर्च ऐप द्वारा कॉन्टैक्ट्स या गैलरी का एक्सेस मांगना), तो इसे निजता का सीधा उल्लंघन माना जाएगा। ऐसे मामलों में भारी आर्थिक जुर्माने के साथ कंपनी के शीर्ष अधिकारियों पर आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है।
डिजिटल अधिकारों की एक बड़ी जीत
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी आदेश दिया है कि नागरिकों को ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ (Right to be Forgotten) का अधिकार होगा। यानी, यदि कोई यूजर किसी प्लेटफॉर्म से अपना अकाउंट डिलीट करता है, तो कंपनी को अपने सर्वर से उसका सारा डेटा हमेशा के लिए मिटाना होगा। साइबर लॉ एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को भारत के डिजिटल नागरिकों के लिए ‘मैग्ना कार्टा’ (Magna Carta) करार दिया है। इस फैसले के बाद भारत में काम कर रही सभी बहुराष्ट्रीय टेक कंपनियों और डेटा ब्रोकर्स को अपने बिजनेस मॉडल और प्राइवेसी पॉलिसी में तत्काल प्रभाव से बड़े बदलाव करने होंगे।



