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कांग्रेस करेगी रन फॉर अंबेडकर, रन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ मैराथन की मेजबानी 

भारत के प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने अप्रैल माह को सामाजिक न्याय के महीने के रूप में मनाने का निर्णय लिया है और इस क्रम में 12 अप्रैल को ‘रन फॉर अंबेडकर, रन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ मैराथन ( Run for Ambedkar, Run for Constitution Marathon) की मेजबानी कांग्रेस करेगी। 12 अप्रैल के लिए 7,000 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया है, और यह संख्या लगभग 15,000 तक पहुंचने की उम्मीद है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने घोषणा की है कि वह अप्रैल को “सामाजिक न्याय माह” ( Social justice month) के रूप में मनाएगी क्योंकि यह महीना समानता के संघर्ष से जुड़े कई समाज सुधारकों और नेताओं की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाएगा। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि देशभर में कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा, जिसकी शुरुआत 11 अप्रैल को लखनऊ में ज्योतिराव फुले की जयंती मनाने के साथ होगी।

14 अप्रैल को भारत रत्न और संविधान निर्माता डॉ भीम राव अंबेडकर की जयंती है और इस उपलक्ष्य में कांग्रेस ने उनके योगदानों को याद करते हुए इवेंट्स आयोजित करने का निर्णय किया है।

आपको बता दें कि ज्योतिबा फुले, जिनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को हुआ था, एक अग्रणी समाज सुधारक थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी रूढ़िवाद को चुनौती दी और दलितों एवं महिलाओं के अधिकारों के लिये संघर्ष किया। फुले को भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।

ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने वर्ष 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला और बाद में वर्ष 1855 में पुणे में श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के लिये रात्रि विद्यालयों की शुरुआत की थी। ज्योतिबा फुले ने जातिगत उत्पीड़न का विरोध किया, चिपलूणकर और तिलक जैसे ब्राह्मणवादी विचारकों की आलोचना की, उत्पीड़ित वर्गों तथा महिलाओं के उत्थान के लिये ब्रिटिश शासन का समर्थन किया था।

ज्योतिबा फुले ने वर्ष 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित पदानुक्रम के खिलाफ संघर्ष करना था। अपनी पुस्तक गुलामगिरी में उन्होंने जातिगत उत्पीड़न की तुलना अमेरिकी दासता से की।
ज्योतिबा फुले थॉमस पेन की ‘द राइट्स ऑफ मैन’ से प्रभावित थे और सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिये महिलाओं और निचली जातियों की शिक्षा को कुंजी के रूप में देखते थे। उन्हें 11 मई, 1888 को एक महाराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता विठ्ठलराव कृष्णाजी वंदेकर द्वारा महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया गया।

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