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एकजुटता के दावों के बीच बिखराव: DMK का कांग्रेस पर ‘धोखे’ का आरोप

बैठक से AAP की दूरी; क्या धरातल पर आने से पहले ही दरक रहा है 'INDIA' गठबंधन?

नई दिल्ली/पल्लवी श्रीवास्तव | राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विपक्षी एकजुटता का जो भव्य तंबू ताना गया था, उसकी खूंटियां हिलती हुई नजर आ रही हैं। सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ 23 राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने का दावा जितना ऐतिहासिक दिखाई दे रहा था, पर्दे के पीछे की कड़वाहट उतनी ही तेजी से सतह पर आ गई है। इस महाबैठक के शुरू होने से ठीक पहले दक्षिण से लेकर उत्तर तक के दो सबसे बड़े सहयोगियों—द्रमुक (DMK) और आम आदमी पार्टी (AAP)—के कड़े रुख ने यह साफ कर दिया है कि ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। तमिलनाडु में सत्ता संभाल रही द्रमुक ने जहां कांग्रेस पर सीधे ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाते हुए बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया, वहीं आम आदमी पार्टी ने भी इस सियासी कवायद से दूरी बना ली।

तमिलनाडु की रार: द्रविड़ राजनीति में क्यों आई खटास?
विपक्षी गठबंधन के लिए सबसे बड़ा झटका दक्षिण भारत के उसके सबसे मजबूत किले तमिलनाडु से लगा है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की पार्टी डीएमके ने अंतिम समय पर दिल्ली की बैठक में न शामिल होने का जो फैसला लिया, वह कोई अचानक लिया गया कदम नहीं था। सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु में स्थानीय निकाय चुनावों और हालिया प्रशासनिक नियुक्तियों को लेकर कांग्रेस और डीएमके के बीच पिछले कई महीनों से खींचतान चल रही थी। डीएमके के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि कांग्रेस राज्य में अपनी वास्तविक जमीन से ज्यादा की मांग कर रही है और राष्ट्रीय राजनीति की आड़ में क्षेत्रीय दलों पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।

डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र को बचाने के लिए साथ आए थे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस हमारे घरेलू मैदान पर हमारे ही हितों को नुकसान पहुंचाए। जब तक स्थानीय स्तर पर सम्मान और न्याय नहीं मिलता, तब तक दिल्ली के बंद कमरों में मुस्कुराती हुई तस्वीरें खिंचवाने का कोई मतलब नहीं है।” डीएमके द्वारा खुलकर ‘धोखे’ और ‘विश्वासघात’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना यह दर्शाता है कि यह कड़वाहट इतनी गहरी हो चुकी है जिसे केवल एक बैठक से सुलझाया नहीं जा सकता।

केजरीवाल की ‘आप’ का रणनीतिक अलगाव
दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी (AAP) की अनुपस्थिति ने विपक्षी खेमे में एक और बड़ा छेद कर दिया है। दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस की धुर विरोधी रही ‘आप’ के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हाथ मिलाना हमेशा से ही एक रणनीतिक मजबूरी रहा है। लेकिन जून 2026 के इस सियासी मोड़ पर, आप नेतृत्व ने यह भांप लिया है कि दिल्ली आर्डिनेंस और पंजाब के स्थानीय मुद्दों पर कांग्रेस का रुख अभी भी ढुलमुल है। पंजाब में कांग्रेस और आप के राज्य स्तर के नेता हर दिन एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें भांज रहे हैं। ऐसे में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी के लिए दिल्ली में कांग्रेस नेताओं के साथ मंच साझा करना अपने ही काडर को भ्रमित करने जैसा था। इसलिए, आप ने इस बैठक से ‘रणनीतिक दूरी’ बनाना ही बेहतर समझा।

विश्लेषण: क्या केवल कागजी है यह एकता?
एक राजनीतिक विश्लेषक के रूप में, मेरा मानना है कि ‘इंडिया’ गठबंधन का सबसे बड़ा संकट यह है कि इसके पास राज्यों के स्तर पर चल रहे विरोधाभासों का कोई ठोस जवाब नहीं है। तमिलनाडु में डीएमके का गुस्सा और दिल्ली-पंजाब में आप की दूरी यह साबित करती है कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के बड़े भाई की भूमिका को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। जब तक सीटों के बंटवारे और क्षेत्रीय स्वायत्तता को लेकर कोई पारदर्शी और सम्मानजनक फॉर्मूला नहीं बनता, तब तक विपक्षी एकजुटता के ये बड़े-बड़े दावे केवल कागजी ही साबित होंगे।

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