Trending

पश्चिम बंगाल में ‘चुनाव बाद हिंसा’ का अंतहीन सिलसिला

अभिषेक बनर्जी आज करेंगे पीड़ितों से मुलाकात, क्या शांत होगा सियासी बवंडर?

पश्चिम बंगाल की राजनीति और ‘चुनावी हिंसा’ का चोली-दामन का साथ बन चुका है। हाल ही में फाल्टा (Falta) विधानसभा उपचुनाव के चौंकाने वाले नतीजों (जिसमें भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की) के बाद, राज्य के कई हिस्सों में ‘चुनाव बाद हिंसा’ (Post-Poll Violence) की आग फिर से भड़क उठी है। बिगड़ते हालात को काबू में करने और राजनीतिक डैमेज कंट्रोल (Damage Control) के लिए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी 30 मई को हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करेंगे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात करेंगे।

पश्चिम बंगाल में जब भी सत्ता का संतुलन बिगड़ता है या विपक्ष मजबूत होता है, तो उसका परिणाम सड़कों पर खूनी संघर्ष के रूप में दिखाई देता है। फाल्टा में TMC उम्मीदवार की जमानत जब्त होने और भाजपा की 1 लाख से अधिक वोटों से जीत ने सत्तारूढ़ दल के जमीनी कार्यकर्ताओं में गहरी हताशा पैदा कर दी है। नतीजों की घोषणा के कुछ घंटों के भीतर ही दक्षिण 24 परगना, मिदनापुर और उत्तर 24 परगना के कई इलाकों में भाजपा (BJP) और वामदलों (CPI-M) के दफ्तरों पर कथित तौर पर बमबारी और आगजनी की घटनाएं सामने आईं।

अभिषेक बनर्जी के दौरे के रणनीतिक मायने:
विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह हिंसा TMC के गुंडों द्वारा सत्ता के संरक्षण में की जा रही है। इन गंभीर आरोपों और राष्ट्रीय स्तर पर हो रही फजीहत के बीच, अभिषेक बनर्जी का यह दौरा एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

नैरेटिव बदलना (Changing the Narrative): अभिषेक बनर्जी यह संदेश देना चाहते हैं कि हिंसा एकतरफा नहीं है, बल्कि TMC के कार्यकर्ता भी विपक्ष के हमलों का शिकार हुए हैं।

कैडर का मनोबल: फाल्टा की करारी हार से निराश पार्टी कैडर (Cadre) का मनोबल बढ़ाने और उन्हें एकजुट रखने के लिए शीर्ष नेतृत्व का उनके बीच जाना आवश्यक हो गया था।

केंद्र सरकार और राज्यपाल की नजर:
केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) बंगाल की कानून-व्यवस्था की स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए है। राज्य के राज्यपाल ने पहले ही मुख्य सचिव (Chief Secretary) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को तलब कर सख्त निर्देश दिए हैं कि उपद्रवियों पर बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के तुरंत कार्रवाई की जाए।

यह चुनाव बाद की हिंसा केवल एक राजनीतिक लड़ाई नहीं है; यह बंगाल के लोकतांत्रिक ढांचे (Democratic Fabric) पर एक बड़ा कलंक है। जब तक राजनीतिक दल अपने मतभेदों को बैलट बॉक्स (Ballot Box) तक सीमित रखना नहीं सीखेंगे, तब तक राज्य का आम नागरिक इसी तरह खौफ के साये में जीने को मजबूर रहेगा।

Related Articles

Back to top button