बंगाल चुनाव परिणाम 2026: ममता की हैट्रिक या खिलेगा पहली बार कमल? 92% रिकॉर्ड वोटिंग ने बढ़ाई धड़कनें, ये 5 फैक्टर पलटेंगे बाजी

Kolkata : पश्चिम बंगाल की सत्ता का ‘महामुकाबला’ अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। कल यानी सोमवार की सुबह जब ईवीएम (EVM) के पिटारे खुलेंगे, तो साफ हो जाएगा कि बंगाल की जनता ने ‘दीदी’ के 15 साल के काम पर मुहर लगाई है या ‘परिवर्तन’ की नई इबारत लिखी है। इस बार का चुनाव राज्य के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुका है। आजादी के बाद पहली बार किसी राज्य में 92 प्रतिशत से अधिक रिकॉर्ड मतदान हुआ है। दो चरणों में संपन्न हुए इस शांत चुनाव ने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया है। दोपहर 12 बजे तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि रायटर्स बिल्डिंग (नबन्ना) की चाबी किसके हाथ में होगी।
92% वोटिंग और माइग्रेंट वर्कर्स: चुनावी गणित का ‘X-फैक्टर’
इस चुनाव का सबसे बड़ा चौंकाने वाला पहलू 92 प्रतिशत से अधिक का मतदान दर है। 2021 के 81.56 प्रतिशत के आंकड़े को पीछे छोड़ते हुए जनता ने जिस तरह बूथों पर लाइन लगाई, उसने दोनों पार्टियों की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी भारी वोटिंग के पीछे ‘माइग्रेंट वर्कर्स’ (प्रवासी श्रमिक) का बड़ा हाथ है, जो बड़ी संख्या में वोट डालने अपने घर लौटे हैं। पहले चरण की 152 सीटों पर हर विधानसभा में औसतन 13,800 वोट बढ़े हैं, जबकि दूसरे चरण में शहरी प्रभाव के बावजूद भारी मतदान हुआ है। यह बढ़ा हुआ वोट शेयर सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का संकेत है या सत्ता बरकरार रखने का उत्साह, यह कल स्पष्ट होगा।
भाजपा के पक्ष में ‘एंटी-इनकंबेंसी’ और ‘महिला सुरक्षा’ की लहर
बीजेपी इस बार सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के 15 साल के शासन के खिलाफ मैदान में है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज कांड और कस्बा लॉ कॉलेज जैसी घटनाओं ने महिला सुरक्षा के मुद्दे को हवा दी है, जिससे टीएमसी रक्षात्मक मुद्रा में दिखी। इसके अलावा, 26,000 नौकरियों के रद्द होने और भर्ती घोटाले के आरोपों ने शिक्षित युवाओं और मिडिल क्लास के बीच सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा किया है। भाजपा का ‘3,000 रुपये प्रति माह’ का वादा सीधे तौर पर टीएमसी के ‘लक्ष्मी भंडार’ को चुनौती दे रहा है। साथ ही, आलू किसानों की नाराजगी और बेलडांगा की घटनाओं के बाद हुए ध्रुवीकरण का सीधा लाभ भगवा खेमे को मिलने की उम्मीद है।
लक्ष्मी भंडार और बूथ मैनेजमेंट: टीएमसी की अभेद्य दीवार
भले ही सत्ता विरोधी लहर की चर्चा हो, लेकिन जमीनी हकीकत में टीएमसी का ‘बूथ लेवल मैनेजमेंट’ आज भी बेजोड़ माना जाता है। ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना ग्रामीण बंगाल की महिलाओं के बीच किसी वरदान से कम नहीं है। कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाओं ने महिलाओं का एक वफादार वोट बैंक तैयार किया है। इसके अलावा, 2024 के लोकसभा नतीजों के बाद जंगलमहल में टीएमसी की वापसी और मुस्लिम मतदाताओं का टीएमसी की ओर झुकाव ममता बनर्जी के लिए बड़ी राहत की बात है। अगर ग्रामीण क्षेत्रों में महिला वोट बैंक सुरक्षित रहा, तो भाजपा के लिए ‘कमल’ खिलाना मुश्किल हो सकता है।
तीसरी ताकत की भूमिका: किसका बिगाड़ेंगे खेल?
बंगाल के इस रण में लेफ्ट, कांग्रेस, ISF और हुमायूं कबीर की पार्टी की भूमिका निर्णायक होने वाली है। कई सीटों पर कांटे की टक्कर है, जहां हार-जीत का अंतर महज 2 से 5 हजार वोटों का हो सकता है। अगर वाम-कांग्रेस गठबंधन सत्ता विरोधी वोटों (Anti-Establishment Votes) को काटने में सफल रहता है, तो इसका सीधा नुकसान भाजपा को होगा। वहीं, अगर ISF और अन्य छोटे दल मुस्लिम वोटों में सेंध लगाते हैं, तो ममता बनर्जी का किला ढह सकता है। 27 लाख नामों का SIR लिस्ट से बाहर होना भी एक ऐसा मुद्दा है, जो पर्दे के पीछे से नतीजों को प्रभावित कर सकता है।



