अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध का साया
डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी चेतावनी, "सैन्य हमलों को टालने का यह 'आखिरी मौका' है"
राघवेन्द्र प्रताप सिंह/ वाशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच दशकों पुराने भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर दुनिया को चिंता में डाल दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने ओवल ऑफिस से एक बेहद सख्त और स्पष्ट चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि ईरान के साथ वर्तमान में चल रही राजनयिक वार्ता तेहरान के लिए संभावित अमेरिकी सैन्य हमलों को टालने का “आखिरी मौका” (Last Chance) है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया को संबोधित करते हुए खुलासा किया कि अमेरिका ईरान पर एक बड़ा और विनाशकारी सैन्य हमला (Major Military Operation) करने के लिए पूरी तरह से तैयार था। हालांकि, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर जैसे खाड़ी सहयोगियों के विशेष अनुरोध पर इस योजना को आखिरी मिनट में रोक दिया गया ताकि कूटनीति (Diplomacy) को एक अंतिम अवसर दिया जा सके। ट्रंप ने कहा, “हमने उनके आग्रह पर इस हमले को कुछ समय के लिए रोक दिया है। लेकिन अगर अब ईरान एक अच्छे समझौते (Good Document) पर हस्ताक्षर नहीं करता है, तो यह उनके लिए विनाशकारी साबित होगा। यह कूटनीति के लिए उनका आखिरी मौका है।”
भले ही ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की सीधी बातचीत से इनकार किया है, लेकिन ट्रंप ने दृढ़ता से जोर दिया कि पर्दे के पीछे बातचीत चल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने उम्मीद जताई कि ये वार्ताएं मुख्य रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम (Nuclear Programme) पर अमेरिका की चिंताओं को दूर करने पर केंद्रित होंगी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों (Houthi Rebels) द्वारा लाल सागर और आसपास के क्षेत्रों में वाणिज्यिक तथा तेल टैंकरों पर हमले बढ़ गए हैं। हाल ही में हूतियों ने एक सऊदी हवाई अड्डे पर ड्रोन हमले का दावा किया है, जबकि एक भारतीय मालवाहक जहाज भी यमनी जलक्षेत्र के पास हमले का शिकार होकर डूब गया (हालांकि सभी 14 नाविक सुरक्षित बचा लिए गए)।
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह आक्रामक बयान ‘अधिकतम दबाव’ (Maximum Pressure) की रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान की सैन्य और छद्म (Proxy) क्षमताओं को सीमित करना और एक नए, कड़े परमाणु समझौते के लिए तेहरान को मजबूर करना है। यदि यह कूटनीतिक प्रयास विफल होता है, तो मध्य-पूर्व (Middle East) एक बार फिर विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध की आग में धकेल दिया जाएगा, जिसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।