स्वर्ण मंदिर को मिली नई FCRA मंजूरी: सिख प्रवासियों के जुड़ाव और सेवा कार्यों में आएगी तेजी

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों के वैश्विक जुड़ाव की दिशा में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अमृतसर स्थित पवित्र स्वर्ण मंदिर (श्री हरमंदिर साहिब) को विदेशी चंदा विनियमन अधिनियम (FCRA) के तहत नई और विस्तारित मंजूरी प्रदान कर दी है। इस फैसले का उद्देश्य दुनिया भर में बसे लाखों सिख प्रवासियों (Diaspora) को उनके पवित्र तीर्थ स्थल से सीधे जोड़ना और मंदिर द्वारा चलाए जा रहे विशाल सेवा कार्यों को और अधिक मजबूती प्रदान करना है।
क्या है FCRA और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
विदेशी चंदा विनियमन अधिनियम (FCRA) एक ऐसा कानून है जो भारत में किसी भी संस्था या गैर-सरकारी संगठन (NGO) द्वारा विदेशों से प्राप्त होने वाले चंदे को नियंत्रित करता है। बिना FCRA पंजीकरण के कोई भी भारतीय संस्था विदेश से कानूनी रूप से नकद दान स्वीकार नहीं कर सकती है। स्वर्ण मंदिर को मिली इस नई मंजूरी के बाद, अब अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप सहित दुनिया के किसी भी कोने में बैठा श्रद्धालु सीधे तौर पर श्री हरमंदिर साहिब के बैंक खातों में अपना दान (दसवंध) भेज सकेगा।
सेवा कार्यों को मिलेगी नई उड़ान
स्वर्ण मंदिर का लंगर विश्व भर में प्रसिद्ध है, जहां हर दिन लाखों लोगों को बिना किसी भेदभाव के मुफ्त भोजन कराया जाता है। इसके अलावा, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) द्वारा अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और आपदा राहत कार्य भी संचालित किए जाते हैं।
विदेशी चंदे का यह सीधा प्रवाह इन कार्यों को और अधिक सुचारू रूप से चलाने में मदद करेगा। नई FCRA मंजूरी के तहत प्राप्त धन का उपयोग विशेष रूप से:
- * मुफ्त चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार
- * गरीब और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा
- * पर्यावरण संरक्षण और लंगर व्यवस्था को अधिक आधुनिक बनाने में किया जाएगा।
पारदर्शिता पर विशेष जोर
गृह मंत्रालय ने इस मंजूरी के साथ ही वित्तीय पारदर्शिता (Financial Transparency) की शर्तों को भी स्पष्ट किया है। SGPC को विदेशी चंदे का पूरा हिसाब रखने और सरकार द्वारा निर्धारित ऑडिट प्रक्रियाओं का पालन करने का निर्देश दिया गया है।
वैश्विक सिख समुदाय में खुशी की लहर
सरकार के इस फैसले का वैश्विक सिख समुदाय ने भारी स्वागत किया है। लंबे समय से प्रवासी सिखों की यह मांग थी कि उन्हें अपने गुरुद्वारे की सेवा में सीधे योगदान करने का एक पारदर्शी और कानूनी माध्यम मिलना चाहिए। यह कदम न केवल धार्मिक आस्था का सम्मान है, बल्कि भारत और उसके प्रवासियों के बीच के सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंधों को भी मजबूत करेगा।T



