Trending

नागरिकता विवाद: विदेश मंत्रालय का अहम स्पष्टीकरण— “पासपोर्ट नागरिकता का कानूनी दस्तावेज नहीं है”

विवेक ओझा | नई दिल्ली: देश में नागरिकता को लेकर चल रही बहसों और कानूनी विवादों के बीच विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बेहद अहम और बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। मंत्रालय ने साफ तौर पर कहा है कि ‘भारतीय पासपोर्ट’ को नागरिकता का अंतिम और अकाट्य कानूनी दस्तावेज नहीं माना जा सकता है। विदेश मंत्रालय का यह बयान उन कई मामलों और बहसों के संदर्भ में काफी महत्वपूर्ण है, जहां नागरिकता साबित करने के लिए पासपोर्ट को ही मुख्य आधार मान लिया जाता है।

मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज

विदेश मंत्रालय के अनुसार, पासपोर्ट मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला एक आधिकारिक पहचान पत्र है। यह पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत जारी किया जाता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य विदेशों में व्यक्ति की पहचान, पता और राष्ट्रीयता स्थापित करना तथा विदेश यात्रा को सुगम बनाना है। हालांकि, जब बात भारतीय नागरिकता अधिनियम, 1955 के कड़े कानूनी पैमानों की आती है, तो यह नागरिकता का ‘एकमात्र’ या ‘अंतिम’ वैधानिक प्रमाण नहीं रह जाता।

गृह मंत्रालय (MHA) के अधिकार क्षेत्र का मामला

नागरिकता से जुड़े मामलों का अंतिम अधिकार विदेश मंत्रालय के पास नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के पास होता है। भारतीय कानून के अनुसार, देश की नागरिकता मुख्य रूप से जन्म, वंश, पंजीकरण (Registration) या प्राकृतिककरण (Naturalization) के आधार पर तय होती है।

अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया के दौरान आवेदक द्वारा दिए गए अन्य दस्तावेजों (जैसे जन्म प्रमाण पत्र, आधार, या मतदाता पहचान पत्र) पर भरोसा किया जाता है। यदि किसी जांच में वे मूल दस्तावेज ही फर्जी या अवैध पाए जाते हैं, तो व्यक्ति का पासपोर्ट रद्द किया जा सकता है। इसलिए, महज पासपोर्ट धारक होना इस बात की पूर्ण कानूनी गारंटी नहीं है कि व्यक्ति भारत का वैध नागरिक है।

अदालतों का रुख और पूर्व के फैसले

विदेश मंत्रालय का यह रुख देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा पूर्व में दिए गए कई महत्वपूर्ण फैसलों के भी अनुरूप है। अतीत में बॉम्बे हाई कोर्ट, गुवाहाटी हाई कोर्ट और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अलग-अलग मामलों में टिप्पणी की है कि पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, राशन कार्ड या पैन कार्ड जैसे दस्तावेज किसी व्यक्ति के पते या सामान्य पहचान का प्रमाण तो हो सकते हैं, लेकिन जब नागरिकता का गंभीर विवाद (जैसे फॉरेन ट्रिब्यूनल या नागरिकता रजिस्टर के मामलों में) उत्पन्न होता है, तो इन्हें नागरिकता का निर्विवाद (indisputable) प्रमाण नहीं माना जा सकता।

आम जनता के लिए इसका क्या अर्थ है?

इस स्पष्टीकरण का सीधा अर्थ यह है कि जिन मामलों में किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कानूनी संदेह या विवाद उत्पन्न होता है, वहां उसे सिर्फ अपना पासपोर्ट दिखाकर क्लीन चिट नहीं मिल सकती। ऐसे कानूनी विवादों में व्यक्ति को अपने जन्म के समय, माता-पिता की राष्ट्रीयता और नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत निर्धारित अन्य जरूरी ऐतिहासिक व कानूनी दस्तावेज प्रस्तुत करने ही होंगे।

विदेश मंत्रालय का यह रुख देश भर में चल रहे नागरिकता संबंधी कानूनी मामलों में स्थिति को स्पष्ट करता है और आम जनता के बीच फैले इस भ्रम को दूर करता है कि पासपोर्ट हासिल कर लेने मात्र से नागरिकता के हर पैमाने को पार कर लिया गया है।

Related Articles

Back to top button