कूटनीति, राजधर्म और ‘संस्कृत’ का सूत्र: पीएम मोदी ने श्लोक के जरिए दिया ‘विवेक और धैर्य’ का महामंत्र
जानिए इस कालजयी सुभाषित के गहरे मायने

नई दिल्ली (राघवेंद्र प्रताप सिंह): राजनीति और वैश्विक कूटनीति के शोर-शराबे और तेज भागती दुनिया के बीच, भारत के प्रधानमंत्री अक्सर प्राचीन भारतीय ज्ञान, ग्रंथों और दर्शन का सहारा लेकर राष्ट्र को बड़े और विचारोत्तेजक संदेश देने के लिए जाने जाते हैं। मंगलवार (16 जून) सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर देशवासियों, नीति-निर्माताओं और युवाओं के सामने एक अत्यंत गहरा वैचारिक दृष्टिकोण रखा है। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, प्रधानमंत्री ने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में कदम उठाने से बचने और ‘विवेक’ (Conscience) व ‘दूरदर्शिता’ के साथ निर्णय लेने के महत्व को रेखांकित करते हुए एक प्रभावशाली संस्कृत सुभाषित साझा किया है।
क्या है वह श्लोक और उसका अर्थ?
प्रधानमंत्री मोदी ने जिस संस्कृत सुभाषित का उल्लेख किया है, वह महाकवि भारवि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य ‘किरातार्जुनीयम्’ का एक बेहद प्रसिद्ध और कालजयी श्लोक है:
“सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥”
पीएम मोदी ने इस श्लोक के मर्म को समझाते हुए कहा कि जीवन में धैर्य, विवेक और दूरदर्शिता (Foresight) से प्रेरित कार्यों के माध्यम से ही सुख और समृद्धि के द्वार खुलते हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हर निर्णय के लिए एक ‘गहन समझ’ (Deep Understanding) आवश्यक है, क्योंकि अंततः सफलता उन्हीं निर्णयों पर आधारित होती है जो उचित सोच-विचार और विमर्श के साथ लिए जाते हैं।
इस श्लोक का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ भी यही है कि मनुष्य को बिना विचारे या अचानक आवेश में आकर कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि अज्ञान और अविवेक घोर विपत्तियों का मूल कारण हैं। इसके विपरीत, जो व्यक्ति सोच-समझकर, हर पहलू का आकलन करके काम करता है, गुणों पर रीझने वाली सफलताएं और संपत्तियां (Wealth and Prosperity) स्वयं उसका चुनाव कर लेती हैं।
राजधर्म और आधुनिक गवर्नेंस का ब्लूप्रिंट
अगर एक रणनीतिक विश्लेषक के नज़रिए से प्रधानमंत्री के इस संदेश को डिकोड किया जाए, तो यह महज़ एक ‘सुविचार’ (Good Thought) या सामान्य प्रेरणादायक संदेश नहीं है। यह असल में ‘राजधर्म’ और ‘ग्लोबल लीडरशिप’ का एक बहुत बड़ा सिद्धांत है।
आज जब पूरी दुनिया—विशेषकर पश्चिम एशिया में चल रहे टकराव और ग्लोबल इकॉनमी में छाई अनिश्चितता—एक भयंकर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, तब भारत का शीर्ष नेतृत्व ‘ठहरकर सोचने’ (Pause and Reflect) की वकालत कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हो या देश की आतंरिक नीतियां, कई बार मीडिया या विपक्ष के तात्कालिक दबाव (Instant Pressure) में सरकारें ऐसे फैसले ले लेती हैं, जिनका दीर्घकालिक नुकसान पूरे राष्ट्र को उठाना पड़ता है।
पीएम मोदी का यह सुभाषित इस बात का साफ कूटनीतिक और प्रशासनिक संकेत है कि भारत सरकार अपनी नीतियों—चाहे वह आर्थिक सुधार हों, सैन्य फैसले हों, या फिर ‘विकसित भारत 2047’ का महासंकल्प—में ‘रिएक्टिव’ (Reactive) होने के बजाय ‘प्रोएक्टिव और थॉटफुल’ (Proactive and Thoughtful) रहने की रणनीति पर अडिग है।
‘इंस्टेंट रिज़ल्ट’ के दौर में एक ‘वेक-अप कॉल’
प्रधानमंत्री का यह संदेश समाज के उस बड़े वर्ग, विशेषकर युवाओं और नौकरशाहों के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है, जो सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस तेज दौर में ‘इंस्टेंट रिज़ल्ट’ (त्वरित परिणाम) की चाह रखता है। तकनीक हमें गति दे सकती है, लेकिन ‘विवेक’ और ‘ज्ञान’ की जगह नहीं ले सकती।
सफलता कभी रातों-रात नहीं मिलती, और जो सफलता बिना ठोस विमर्श और दूरदर्शिता के मिलती है, उसका पतन भी उतनी ही तेज़ी से होता है। ‘विमृश्यकारिणं’ (सोच-समझकर कार्य करने वाले) को ही समृद्धि स्वयं चुनती है—यह भारत का वह प्राचीन ‘सॉफ्ट पावर’ मंत्र है, जिसे पीएम मोदी ने आज 21वीं सदी के संदर्भ में फिर से प्रासंगिक और जीवंत बना दिया है। राजनीति में ‘धैर्य’ का यह पाठ उन सभी के लिए एक बड़ी सीख है, जो सत्ता और सफलता के शिखर पर टिके रहना चाहते हैं।



