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केरल की रार, दिल्ली में दरार?

चुनावी कड़वाहट के बीच 'INDIA' की बैठक में पहुंचे जॉन ब्रिटास, पर वामदल और कांग्रेस के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलना मुश्किल

नई दिल्ली/पल्लवी श्रीवास्तव | कहते हैं कि राजनीति में न तो कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन, लेकिन जब बात केरल की राजनीति की हो, तो यह सिद्धांत भी फेल हो जाता है। नई दिल्ली में आयोजित ‘इंडिया’ गठबंधन की उच्च स्तरीय बैठक में जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) के राज्यसभा सांसद और प्रखर वक्ता जॉन ब्रिटास ने प्रवेश किया, तो विपक्षी खेमे ने राहत की सांस ली। लेकिन इस उपस्थिति के पीछे जो अंतर्विरोध और कड़वाहट छिपी थी, उसे पहचानना मुश्किल नहीं था। केरल में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के दौरान सीपीएम और कांग्रेस के बीच जो तीखी और अमर्यादित जुबानी जंग देखने को मिली, उसने दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच एक ऐसी खाई खोद दी है, जिसे दिल्ली में बैठकर पाटना नामुमकिन लग रहा है।

केरल का राजनीतिक मैदान: जहाँ दोस्त ही सबसे बड़ा दुश्मन है
‘इंडिया’ गठबंधन के सामने सबसे अनोखी और पेचीदा चुनौती केरल राज्य पेश करता है। देश के बाकी हिस्सों में भले ही वामपंथी दल और कांग्रेस एक-दूसरे के सहयोगी हों, लेकिन केरल में ये दोनों ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी हैं। हालिया चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने सीपीएम पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और राजनीतिक हिंसा के गंभीर आरोप लगाए, तो वहीं सीपीएम ने कांग्रेस को ‘भाजपा की बी-टीम’ तक कह डाला। इस चुनावी घमासान में दोनों ही दलों ने एक-दूसरे को राजनीतिक रूप से खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इसी कड़वाहट का असर था कि सीपीएम का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली की बैठक में खुद शामिल होने से हिचकिचा रहा था। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी मोर्चे को कमजोर न दिखने देने की मजबूरी के कारण, पार्टी ने अपने सबसे भरोसेमंद और कूटनीतिक चेहरे जॉन ब्रिटास को प्रतिनिधि बनाकर भेजा। लेकिन बैठक के भीतर की तस्वीरों और नेताओं की शारीरिक भाषा (Body Language) को देखें, तो यह साफ था कि जॉन ब्रिटास और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच एक गहरी असहजता मौजूद थी।

जॉन ब्रिटास की मौजूदगी: मजबूरी या मज़बूत रणनीति?
बैठक के गलियारों से छनकर आई खबरों के मुताबिक, जॉन ब्रिटास ने बैठक में अपनी बात बेहद मजबूती से रखी, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय स्तर की एकजुटता को राज्यों के राजनीतिक सरोकारों पर थोपा नहीं जा सकता। सीपीएम के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि अगर वह दिल्ली में कांग्रेस के साथ बहुत ज्यादा घुली-मिली नजर आती है, तो केरल में उसका अपना कोर वोटर बेस खिसक सकता है, जो दशकों से कांग्रेस विरोधी राजनीति पर पला-बढ़ा है।

“हम फासीवाद के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा मंच का हिस्सा हैं, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम राज्यों में अपने वैचारिक सिद्धांतों और राजनीतिक वजूद के साथ समझौता कर लेंगे।”

— सीपीएम के एक आंतरिक सूत्र का बयान

क्या होगा इस अंतर्विरोध का परिणाम?
ग्राउंड रिपोर्टिंग और राजनीतिक समझ यह कहती है कि केरल का यह मॉडल ‘इंडिया’ गठबंधन की सबसे कमजोर कड़ी है। एक ही समय में केरल में एक-दूसरे के खिलाफ जान की बाजी लगाना और दिल्ली में आकर गले मिलना, आम जनता और कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतरता। जॉन ब्रिटास ने बैठक में शामिल होकर औपचारिकता तो पूरी कर दी है, लेकिन केरल चुनाव के दौरान जो गहरे जख्म दोनों पार्टियों ने एक-दूसरे को दिए हैं, वे इतनी जल्दी भरने वाले नहीं हैं। आने वाले समय में यह तनाव गठबंधन की निर्णय लेने की क्षमता को और प्रभावित कर सकता है।

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