भारतीय लोकतंत्र में बड़े सुधार की आहट
'एक देश, एक चुनाव' पर महामंथन के लिए जून में बुलाया गया संसद का विशेष सत्र, अधिसूचना जारी

भारतीय चुनावी प्रणाली और लोकतांत्रिक ढांचे में एक युगांतरकारी बदलाव की दिशा में केंद्र सरकार ने कदम आगे बढ़ा दिए हैं। देश में लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने यानी ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) विधेयक पर ऐतिहासिक चर्चा और इसे पारित करने के उद्देश्य से जून 2026 के अंतिम सप्ताह में संसद का एक विशेष सत्र (Special Session) बुलाया गया है। संसदीय कार्य मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है, जिसने देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
भारत में बार-बार होने वाले चुनावों पर होने वाले भारी-भरकम खर्च और विकास कार्यों में आने वाली रुकावटों (आचार संहिता के कारण) को समाप्त करने के लिए ‘एक देश, एक चुनाव’ का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। अब सरकार इसे कानूनी रूप देने के लिए पूरी तरह तैयार नजर आ रही है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद जारी की गई अधिसूचना के अनुसार, यह विशेष सत्र जून के अंतिम सप्ताह में शुरू होगा और इसमें केवल इसी विषय से जुड़े विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।
क्यों बुलाया गया है संसद का विशेष सत्र?
संसद का सामान्य सत्र (मानसून सत्र) अमूमन जुलाई या अगस्त में शुरू होता है, लेकिन सरकार ने इस बेहद महत्वपूर्ण विधेयक को बिना किसी देरी के पटल पर रखने के लिए विशेष सत्र का सहारा लिया है।
संविधान के अनुच्छेद 85(1) के तहत राष्ट्रपति को संसद का सत्र बुलाने का अधिकार है। इस विशेष सत्र का एकमात्र एजेंडा ‘एक देश, एक चुनाव’ पर गठित उच्च स्तरीय समिति (कोविंद समिति) की सिफारिशों को लागू करना और इस पर संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में सर्वसम्मति बनाना है।
‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्क
इस ऐतिहासिक विधेयक को लेकर देश के राजनीतिक दलों और विचारकों के बीच स्पष्ट रूप से दो धड़े बन गए हैं। इस विषय के पक्ष और विपक्ष के मुख्य तर्कों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
विधेयक के पक्ष में तर्क (लाभ):
* सरकारी खर्च में भारी कमी: देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। एक साथ चुनाव कराने से सरकारी खजाने और राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए जाने वाले हजारों करोड़ रुपये की भारी बचत होगी।
* निरंतर विकास कार्य: बार-बार चुनाव होने से ‘आदर्श चुनाव आचार संहिता’ (Model Code of Conduct) लागू हो जाती है, जिससे नई विकास योजनाओं पर रोक लग जाती है। एक साथ चुनाव होने से विकास कार्य निर्बाध रूप से 5 साल तक चल सकेंगे।
* प्रशासनिक दक्षता: चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों, पुलिस और सरकारी शिक्षकों की बड़े पैमाने पर ड्यूटी लगती है, जिससे आंतरिक सुरक्षा और शिक्षा प्रभावित होती है। एक साथ चुनाव से इन विभागों को बार-बार की चुनावी ड्यूटी से मुक्ति मिलेगी।
विपक्ष के तर्क (चिंताएं और चुनौतियां):
* संघीय ढांचे को खतरा: विपक्ष का सबसे बड़ा तर्क यह है कि राष्ट्रीय और राज्यों के चुनाव एक साथ होने पर क्षेत्रीय या स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय लहर के सामने दब जाएंगे, जिससे राष्ट्रीय पार्टियों को अनुचित लाभ मिलेगा।
* संवैधानिक जटिलताएं: इस व्यवस्था को लागू करने के लिए कई राज्यों की चुनी हुई विधानसभाओं के कार्यकाल को समय से पहले भंग करना पड़ेगा या कुछ का कार्यकाल बढ़ाना पड़ेगा, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ माना जा रहा है।
* भारी शुरुआती ढांचागत खर्च: पूरे देश में एक ही दिन या एक ही चरण में मतदान कराने के लिए निर्वाचन आयोग को लाखों नई ईवीएम (EVM), वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की आवश्यकता होगी, जिस पर शुरुआत में हजारों करोड़ का भारी खर्च आएगा।
किन संवैधानिक अनुच्छेदों में करना होगा संशोधन?
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, ‘एक देश, एक चुनाव’ को धरातल पर उतारना इतना आसान नहीं है। इसके लिए संसद को भारत के संविधान में कम से कम 5 महत्वपूर्ण अनुच्छेदों में संशोधन करना होगा:
1. अनुच्छेद 83: लोकसभा के कार्यकाल से संबंधित।
2. अनुच्छेद 85: राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने की शक्ति से संबंधित।
3. अनुच्छेद 172: राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल से संबंधित।
4. अनुच्छेद 174: राज्यपाल द्वारा विधानसभा को भंग करने की शक्ति से संबंधित।
5. अनुच्छेद 356: राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के प्रावधान से संबंधित।
चूंकि यह संशोधन भारत के संघीय ढांचे (Federal Structure) को प्रभावित करता है, इसलिए संसद में दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद इसे देश के कम से कम 50 प्रतिशत राज्यों की विधानसभाओं से भी अनुमोदित (Ratify) कराना अनिवार्य होगा।
राजनीतिक दलों की धड़कनें तेज
सरकार के इस फैसले के बाद से ही सभी राजनीतिक दलों ने अपने सांसदों को दिल्ली में मौजूद रहने के व्हिप (Whip) जारी करने की तैयारी शुरू कर दी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगी दल इसे देश के हित में एक क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं, जो देश को निरंतर चुनावी मोड से बाहर निकाल कर ‘सुशासन’ (Good Governance) की ओर ले जाएगा।
इसके विपरीत, प्रमुख विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार इस विधेयक के जरिए क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को समाप्त करना चाहती है। विपक्ष ने इस विशेष सत्र के दौरान सरकार को घेरने और इस विधेयक का पुरजोर विरोध करने के लिए एक साझा रणनीति बनाने की बात कही है। बहरहाल, जून का यह अंतिम सप्ताह भारतीय संसदीय इतिहास का एक ऐसा पन्ना लिखने जा रहा है, जिसका असर आने वाले दशकों तक देश की राजनीति और शासन व्यवस्था पर दिखाई देगा।



