मध्य पूर्व में फिर गहराया संकट
ईरान के 14-सूत्रीय शांति प्रस्ताव को अमेरिका ने किया खारिज, ट्रंप ने रखी कड़ी शर्त

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीतिक मोर्चे पर मध्य पूर्व (Middle East) से एक बेहद बड़ी और चिंताजनक खबर सामने आ रही है। लंबे समय से ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चला आ रहा सैन्य और कूटनीतिक तनाव अब एक नए और खतरनाक गतिरोध पर पहुंच गया है। वैश्विक शांति की उम्मीदों को उस वक्त एक बड़ा झटका लगा, जब ईरान द्वारा पेश किए गए एक नए शांति प्रस्ताव को संयुक्त राज्य अमेरिका ने सिरे से खारिज कर दिया। इस कूटनीतिक गतिरोध ने दुनिया भर के शेयर बाजारों और वैश्विक तेल आपूर्ति (Global Oil Supply) को लेकर गहरी चिंताएं पैदा कर दी हैं, जिसका सीधा असर आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दिख सकता है।
क्या है ईरान का 14-सूत्रीय शांति प्रस्ताव?
अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, ईरान ने क्षेत्रीय तनाव को कम करने और एक बड़े युद्ध से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों के जरिए एक ’14-सूत्रीय शांति प्रस्ताव’ (14-Point Peace Plan) अमेरिका और पश्चिमी देशों के सामने रखा था। इस प्रस्ताव में कई अहम बातें शामिल थीं। सबसे प्रमुख शर्त यह थी कि वैश्विक व्यापार और तेल आपूर्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाने वाले ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही के लिए पूरी तरह से फिर से खोल दिया जाएगा। इसके बदले में ईरान ने मांग की थी कि अमेरिका द्वारा उस पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों (Economic Sanctions) को तत्काल प्रभाव से हटाया जाए और पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में एक स्थायी युद्धविराम (Ceasefire) लागू किया जाए।
अमेरिका की प्रतिक्रिया और राष्ट्रपति ट्रंप का सख्त रुख
शांति की इस पहल को उस समय बड़ा झटका लगा जब अमेरिकी प्रशासन ने इस प्रस्ताव पर गहरा संदेह जताया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस 14-सूत्रीय प्रस्ताव को ईरान की एक ‘कूटनीतिक चाल’ करार देते हुए इसे नामंजूर कर दिया है। व्हाइट हाउस की ओर से स्पष्ट संदेश दिया गया है कि अमेरिका किसी भी ऐसी शर्त को नहीं मानेगा जो ईरान को रणनीतिक फायदा पहुंचाए। राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि जब तक ईरान अपने गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम (Nuclear Weapons Program) और यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पर पूर्ण, पारदर्शी और स्थायी रूप से रोक नहीं लगाता, तब तक किसी भी तरह के युद्धविराम या प्रतिबंधों में ढील पर विचार करना बिल्कुल भी संभव नहीं है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल संकट का मंडराता खतरा
इस शांति वार्ता के विफल होने का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का वह चोकपॉइंट (Chokepoint) है, जहां से दुनिया भर का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत टूटने का मतलब है कि इस समुद्री मार्ग पर व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा का खतरा अभी भी बरकरार है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव ऐसे ही बढ़ता रहा और खाड़ी क्षेत्र में कोई सैन्य टकराव हुआ, तो कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है। इसका सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों पर पड़ेगा, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक मध्य पूर्व के आयात पर निर्भर हैं। तेल के दाम बढ़ने से दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल आएगा और महंगाई का एक नया दौर शुरू हो सकता है।
फिलहाल, मध्य पूर्व में हालात बेहद तनावपूर्ण और अनिश्चित बने हुए हैं। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं और पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) और अन्य यूरोपीय देश पर्दे के पीछे से कूटनीतिक बातचीत को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अमेरिकी प्रतिबंधों के मूल मुद्दे का कोई ठोस समाधान नहीं निकलता, तब तक इस क्षेत्र में युद्ध के बादल मंडराते रहेंगे। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में इस भू-राजनीतिक बिसात पर अगला कदम किसका और क्या होगा।



