पश्चिम बंगाल चुनाव: मतगणना में राज्य कर्मचारियों की तैनाती की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची TMC

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की सरगर्मियों के बीच एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने शुक्रवार को देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है। ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की 1 मई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर यह मांग की है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की मतगणना प्रक्रिया के दौरान राज्य सरकार के कर्मचारियों को ‘काउंटिंग सुपरवाइजर’ (Counting Supervisors) यानी मतगणना पर्यवेक्षकों के रूप में नियुक्त किया जाए। चुनाव के इस अंतिम और सबसे संवेदनशील दौर में टीएमसी का यह कदम एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे रहा है।
क्या है टीएमसी की मुख्य मांग?
तृणमूल कांग्रेस द्वारा दायर इस याचिका का मुख्य फोकस मतगणना केंद्रों (Counting Centers) पर राज्य सरकार के कर्मचारियों की उपस्थिति और भागीदारी सुनिश्चित करना है। आमतौर पर, भारत का चुनाव आयोग (Election Commission) स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए मतगणना के दौरान केंद्रीय कर्मचारियों या बैंक अधिकारियों को सुपरवाइजर के तौर पर तैनात करता है। लेकिन टीएमसी चाहती है कि पश्चिम बंगाल सरकार के अधीन काम करने वाले कर्मचारियों को भी वोटों की गिनती की निगरानी और प्रबंधन की यह अहम जिम्मेदारी सौंपी जाए।
सुप्रीम कोर्ट जाने की नौबत क्यों आई?
पश्चिम बंगाल के चुनावों में हमेशा से ही राजनीतिक दलों और केंद्रीय चुनाव आयोग के बीच टकराव की स्थितियां देखने को मिलती रही हैं। टीएमसी लगातार चुनाव प्रक्रिया में केंद्रीय बलों और केंद्रीय कर्मचारियों के अत्यधिक दखल को लेकर अपनी चिंताएं जताती रही है। पार्टी का मानना है कि राज्य के प्रशासनिक ढांचे और उसके कर्मचारियों पर भी पूरा भरोसा किया जाना चाहिए और उन्हें चुनावी प्रक्रिया से पूरी तरह दरकिनार नहीं किया जाना चाहिए। चुनाव आयोग द्वारा संभवतः इस मांग को न माने जाने के बाद ही पार्टी ने न्यायपालिका का रुख किया है।
मतगणना पर्यवेक्षक (Counting Supervisor) की अहमियत:
किसी भी चुनाव में मतगणना का दिन सबसे तनावपूर्ण और निर्णायक होता है। ‘काउंटिंग सुपरवाइजर’ का कार्य बेहद संवेदनशील होता है। उनकी जिम्मेदारी प्रत्येक ईवीएम (EVM) से निकलने वाले वोटों की सही गिनती की निगरानी करना, डेटा का मिलान करना और किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या विवाद को रोकना होता है। टीएमसी की यह मांग दर्शाती है कि पार्टी मतगणना के दौरान किसी भी स्तर पर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती और चाहती है कि निगरानी तंत्र में राज्य के लोगों का भी प्रतिनिधित्व हो।
विपक्ष की संभावित प्रतिक्रिया और चुनौतियां:
टीएमसी की इस याचिका पर विपक्षी दलों (जैसे बीजेपी, कांग्रेस और वामदल) की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आने की पूरी संभावना है। विपक्षी दल अक्सर यह आरोप लगाते रहे हैं कि राज्य सरकार के कर्मचारी सत्तारूढ़ दल के प्रभाव में काम कर सकते हैं। ऐसे में, यदि राज्य कर्मचारियों को मतगणना जैसी नाजुक प्रक्रिया का प्रभारी बनाया जाता है, तो विपक्ष चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकता है। चुनाव आयोग भी सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका का विरोध कर सकता है, क्योंकि यह उसकी स्थापित निष्पक्ष कार्यप्रणाली के खिलाफ जा सकता है।
अब पश्चिम बंगाल के इस चुनावी महासंग्राम में सभी की निगाहें देश की सर्वोच्च अदालत पर टिक गई हैं। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या फैसला सुनाता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। यदि अदालत टीएमसी की मांग को हरी झंडी देती है, तो यह चुनाव आयोग की पारंपरिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव होगा। वहीं, यदि यह याचिका खारिज होती है, तो मतगणना पुराने स्थापित केंद्रीय नियमों के आधार पर ही होगी। कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह पश्चिम बंगाल चुनावों के अंतिम नतीजों और राज्य की राजनीति पर गहरा असर डालेगा।



