दांव पर केजरीवाल की साख…किरण बेदी से लेकर कुमार विश्वास तक, आप से दूर होते गए अहम स्तंभ

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए अप्रैल 2026 का यह हफ्ता किसी काली रात से कम साबित नहीं हुआ। राजनीति के ‘पोस्टर बॉय’ कहे जाने वाले और अरविंद केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार राघव चड्ढा ने पार्टी को तगड़ा झटका देते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। यह सिर्फ एक इस्तीफ़ा नहीं है, बल्कि ‘आप’ के संसदीय इतिहास की सबसे बड़ी बगावत है, जिसने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर हिलाकर रख दिया है।
राज्यसभा में बड़ी सेंध: ‘दो-तिहाई’ सांसदों के साथ खेल गए राघव
24 अप्रैल की दोपहर दिल्ली की सियासत में उस वक्त भूचाल आ गया, जब राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने एक साथ इस्तीफा देकर भाजपा में विलय का ऐलान कर दिया। इन बागियों में रणनीतिकार संदीप पाठक, स्वाति मालीवाल, क्रिकेटर हरभजन सिंह, अशोक मित्तल, राजिंदर गुप्ता और विक्रम साहनी जैसे दिग्गज नाम शामिल हैं। राज्यसभा में ‘आप’ के कुल 10 सदस्य थे, जिनमें से 7 के जाने के कारण उन पर ‘दल-बदल विरोधी कानून’ भी लागू नहीं होगा, यानी उनकी कुर्सी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।
“गलत पार्टी में सही व्यक्ति था”: चड्ढा का तीखा हमला
भाजपा में शामिल होने के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राघव चड्ढा ने अपनी पुरानी पार्टी पर जमकर प्रहार किए। उन्होंने कहा, “मैं एक गलत पार्टी में सही व्यक्ति था। जिस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ‘आप’ का जन्म हुआ था, वह दल अब अपने बुनियादी सिद्धांतों और मूल्यों से पूरी तरह भटक चुका है।” चड्ढा का यह बयान अरविंद केजरीवाल के लिए एक बड़ा व्यक्तिगत और राजनीतिक घाव माना जा रहा है।
रणनीतिकार भी साथ छोड़ गए, चुनावों से पहले बिखराव
इस टूट का सबसे दुखद पहलू संदीप पाठक का जाना है, जिन्हें आम आदमी पार्टी की चुनावी जीत की मशीन (Election Strategist) माना जाता था। आगामी गुजरात, गोवा और पंजाब के चुनावों से ठीक पहले इतने बड़े चेहरों का साथ छोड़ना पार्टी के लिए किसी ‘डेथ वारंट’ से कम नहीं है। जब पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कानूनी पचड़ों में फंसा हुआ था, तब इन्हीं युवाओं ने संगठन को जिंदा रखा था। अब इनके जाने से पैदा हुए ‘संगठनात्मक शून्य’ को भरना केजरीवाल के लिए नामुमकिन सा लग रहा है।
संस्थापक पहले ही जा चुके, अब कौन बचा?
आम आदमी पार्टी का इतिहास टूटने और बिखरने का रहा है। किरण बेदी, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और कुमार विश्वास जैसे संस्थापक स्तंभ पहले ही वैचारिक मतभेदों के चलते किनारा कर चुके हैं। अब राज्यसभा में ‘आप’ के केवल 3 सदस्य बचे हैं, जिससे संसद के ऊपरी सदन में पार्टी की आवाज लगभग खत्म हो जाएगी। वर्तमान परिस्थितियों में अरविंद केजरीवाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती न केवल कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की है, बल्कि जनता के बीच अपनी ‘साख’ बचाने की भी है।



