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श्रीलंका में आज से एक सप्ताह तक चलने वाली “शांति पदयात्रा” का हो रहा है शुभारंभ 

श्रीलंका में आज से एक सप्ताह तक चलने वाली “शांति पदयात्रा” का शुभारंभ हो रहा है। इस पहल में भाग लेने के लिए श्री पन्नाकारा थेरो के नेतृत्व में वियतनाम से सात बौद्ध भिक्षु देश में पहुंचे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यह कार्यक्रम 28 अप्रैल तक चलेगा।

राष्ट्रपति सचिवालय, प्रमुख मंत्रालयों, तीनों सेनाओं और पुलिस सहित कई श्रीलंकाई संस्थान इस आयोजन का समर्थन कर रहे हैं। राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने अपना पूर्ण समर्थन व्यक्त किया है और आशा जताई है कि यह आध्यात्मिक पहल राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने और वैश्विक समुदाय को शांति का एक गहरा संदेश देने में सहायक होगी।

श्रीलंका में बौद्ध समारोह (पोया दिवस) अत्यधिक भक्ति और सांस्कृतिक जीवंतता के साथ मनाए जाते हैं, जिनमें वेसाक (बुद्ध का जन्म, ज्ञान, परिनिर्वाण), पोसोन (बौद्ध धर्म का आगमन), और एसाला पेराहेरा (कैंडी का प्रसिद्ध जुलूस) मुख्य हैं। इन त्योहारों पर घरों को लालटेनों (वेसाक कूडू) से सजाया जाता है, पंडाल लगते हैं और ‘दान-सील’ (दान और नैतिकता) का पालन किया जाता है।

श्रीलंका के प्रमुख बौद्ध समारोह:

वेसाक पोया (मई): यह सबसे बड़ा त्योहार है जो वैशाख पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दौरान पूरे द्वीप में रोशनी,

वेसाक लालटेन (वेसाक कूडू), और बुद्ध के जीवन को दर्शाने वाले रोशन पंडाल लगाए जाते हैं।

पोसोन पोया (जून): यह श्रीलंका में बौद्ध धर्म के आगमन (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) की याद में मनाया जाता है, विशेष रूप से अनुराधापुर के पास मिहिंतले में, जहाँ अरहत महिंद ने राजा को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया था।

एसाला पेराहेरा (जुलाई/अगस्त): कैंडी में मनाया जाने वाला यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुलूस है, जो पवित्र दंत अवशेष (Temple of the Tooth) के सम्मान में आयोजित किया जाता है, जिसमें पारंपरिक नृत्य और सजे हुए हाथी शामिल होते हैं।

कठिन चीवर दान (Vassa): बौद्ध भिक्षुओं को नया चीवर (वस्त्र) दान करने का यह एक महत्वपूर्ण पुण्य उत्सव है, जो वर्षावास (3 महीने की साधना) के बाद आयोजित किया जाता है।

पोया दिवस: हर पूर्णिमा को ‘पोया’ दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो श्रीलंका में सार्वजनिक अवकाश होता है और लोग मंदिरों में उपवास और ध्यान करते हैं।

एडम पीक (श्री पादा) यात्रा: दिसंबर से अप्रैल तक, तीर्थयात्री पवित्र पदचिह्न के दर्शन करने के लिए एडम पीक पर्वत पर चढ़ाई करते हैं, जिसे बौद्ध, हिंदू और मुस्लिम, तीनों धर्मों के लोग पवित्र मानते हैं।

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