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कल्पक्कम फास्ट ब्रीडर रिएक्टर: भारत के लिए ‘ऊर्जा के अक्षय पात्र’ का निर्माण

कल्पक्कम (तमिलनाडु) स्थित 500 मेगावाट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का अपनी ‘प्रथम क्रिटिकैलिटी’ (First Criticality) प्राप्त करना भारतीय विज्ञान और ऊर्जा सुरक्षा के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय है। प्रथम क्रिटिकैलिटी का सरल अर्थ है—रिएक्टर के कोर में एक आत्मनिर्भर और नियंत्रित परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) श्रृंखला का सफलतापूर्वक शुरू होना। यानी, रिएक्टर अब ‘जीवित’ होकर ऊर्जा उत्पादन के लिए तैयार है। यह केवल एक तकनीकी मील का पत्थर नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य की ऊर्जा स्वतंत्रता का शंखनाद है।

आखिर ‘फास्ट ब्रीडर’ तकनीक इतनी खास क्यों है?
इसे समझने के लिए हमें इसे एक ‘जादुई भट्टी’ के रूप में देखना होगा। पारंपरिक परमाणु रिएक्टर केवल ईंधन जलाते हैं, लेकिन एक ‘ब्रीडर’ (Breeder) रिएक्टर जितना विखंडनीय (Fissile) ईंधन खपत करता है, प्रतिक्रिया के दौरान उससे कहीं अधिक नए ईंधन का निर्माण भी करता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ ऊर्जा भी पैदा होती है और भविष्य के लिए नया ईंधन भी तैयार होता है।

डॉ. होमी भाभा के त्रि-स्तरीय स्वप्न की धुरी
यह उपलब्धि भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. होमी जहांगीर भाभा द्वारा परिकल्पित ‘त्रि-स्तरीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम’ का दूसरा और सबसे जटिल चरण है:
* पहला चरण: प्राकृतिक यूरेनियम से चलने वाले रिएक्टर (जो भारत पहले ही सफलतापूर्वक चला रहा है)।
* दूसरा चरण (वर्तमान उपलब्धि): कल्पक्कम का यह FBR, जो पहले चरण से निकले ‘कचरे’ (प्लूटोनियम) का उपयोग करेगा और ऊर्जा के साथ-साथ यूरेनियम-233 बनाएगा।
* तीसरा चरण: थोरियम आधारित रिएक्टर।

विश्व पटल पर भारत का दबदबा और रैंक
इस ऐतिहासिक कदम के साथ, भारत एक बेहद विशिष्ट ‘ग्लोबल एलीट क्लब’ में शामिल हो गया है। वर्तमान में विश्व में रूस ही एकमात्र ऐसा देश है जो व्यावसायिक स्तर पर फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों का सफलतापूर्वक संचालन कर रहा है। अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे विकसित देशों ने इस तकनीक पर दशकों पहले प्रयोग किए थे, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के कारण इसे व्यावसायिक रूप नहीं दे पाए। चीन अभी भी इस दिशा में संघर्ष कर रहा है।

इस 500 MWe रिएक्टर के शुरू होने से, ‘क्लोज्ड फ्यूल साइकिल’ (Closed Fuel Cycle) तकनीक के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष दो देशों में शुमार हो गया है।

इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बहुआयामी फायदे:

1. थोरियम के खजाने की चाबी: भारत के पास यूरेनियम कम है, लेकिन दुनिया का सबसे बड़ा थोरियम भंडार (केरल और पूर्वी तटों की रेत में) मौजूद है। यह FBR उस थोरियम को उपयोगी परमाणु ईंधन में बदलने के लिए एक ‘ब्रिज’ (पुल) का काम करेगा।
2. परमाणु कचरे (Nuclear Waste) का समाधान: यह रिएक्टर पुराने परमाणु कचरे को ईंधन के रूप में फिर से इस्तेमाल कर लेता है। इससे रेडियोधर्मी कचरे के निस्तारण की समस्या लगभग खत्म हो जाती है और पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
3. ऊर्जा संप्रभुता (Energy Sovereignty): जब तीसरा चरण पूरी तरह सक्रिय होगा, तो भारत को कोयले या खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। यह देश को अगले कई सौ वर्षों तक निर्बाध बिजली दे सकता है।
4. क्लाइमेट चेंज और नेट-जीरो: जलवायु परिवर्तन के इस दौर में, यह बिना कार्बन उत्सर्जन किए 24×7 बेसलोड बिजली प्रदान करेगा, जो भारत के 2070 के ‘नेट-जीरो’ लक्ष्यों को प्राप्त करने में ब्रह्मास्त्र साबित होगा।

कल्पक्कम रिएक्टर की ‘फर्स्ट क्रिटिकैलिटी’ केवल मेगावाट के आंकड़े नहीं हैं; यह दशकों से चले आ रहे पश्चिमी देशों के तकनीकी एकाधिकार का कड़ा जवाब है। यह सिद्ध करता है कि आत्मनिर्भरता के पथ पर चलता भारत अब दुनिया से तकनीक मांगता नहीं है, बल्कि दुनिया को तकनीक की नई राह दिखाता है।

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