इजरायल चुनाव में किसी को बहुमत नहीं, त्रिशंकु संसद की हुई पुष्टि; नेतन्याहू बोले- इस्लामीकरण की हो रही साजिश

अभिषेक सिंह
यरुशलम: इजरायल में हुए आम चुनावों के अंतिम नतीजों ने त्रिशंकु संसद (हंग पार्लियामेंट) की पुष्टि कर दी है, जिसके बाद देश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। आधिकारिक नतीजों के अनुसार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी गठबंधन ने 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में बहुमत खो दिया है, जिससे सरकार गठन को लेकर अनिश्चितता गहरा गई है। इस बीच, नेतन्याहू ने चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप और इस्लामीकरण की साजिश का गंभीर आरोप लगाया है।
नेतन्याहू के गंभीर आरोप
अंतिम परिणाम घोषित होने के बाद नेतन्याहू ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा कि यह चुनाव प्रक्रिया के लिए "भूकंप सरीखी" घटना है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव नतीजों को प्रभावित करने के लिए मतदाताओं को रिश्वत दी गई। नेतन्याहू ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "यह देश की संसद पर कब्जा करने और इजरायल के इस्लामीकरण की साजिश है।" उनका यह बयान अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों की ओर इशारा करता है, जिन्होंने इस चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है।
शिन बेट को सौंपी गई जांच
नेतन्याहू के इन आरोपों के बाद चुनाव समिति के प्रमुख जस्टिस नोआम सोलबर्ग ने विदेशी धन के जरिए चुनाव को प्रभावित करने के आरोपों की जांच इजरायल की आंतरिक खुफिया एजेंसी 'शिन बेट' को सौंप दी है। राष्ट्रपति आइजक हरजोग ने भी सभी तथ्यों और आरोपों की जल्द से जल्द जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं। नेतन्याहू ने विशेष रूप से 'राएम' (Ra'am) पार्टी को निशाना बनाया है, जिसने आठ सीटें जीती हैं और वह अरबों के एक अन्य दल 'ज्वाइंट लिस्ट' के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी।
विपक्ष ने किया पलटवार
नेतन्याहू के इन आरोपों को विपक्ष ने सिरे से खारिज कर दिया है। विपक्षी नेता गैडी आइजनकोट और अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के नेताओं ने नेतन्याहू पर चुनाव की वैधता को कमजोर करने और नतीजों में देरी करने का आरोप लगाया है। आइजनकोट ने कहा कि नेतन्याहू अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं और इसीलिए वे ऐसे निराधार आरोप लगा रहे हैं। वहीं, नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों पर चुनाव "चुराने" का आरोप लगाया है।
क्यों है त्रिशंकु संसद?
इजरायल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों का बहुमत आवश्यक है। अंतिम नतीजों के अनुसार, किसी भी गठबंधन को यह बहुमत नहीं मिल पाया है। नेतन्याहू के गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जबकि विपक्षी गठबंधन भी बहुमत के आंकड़े से दूर है। ऐसे में अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई हैं, और अब सरकार का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन उनके साथ गठबंधन करने में सफल होता है।
आगे की राजनीतिक अनिश्चितता
त्रिशंकु संसद के गठन के बाद इजरायल में राजनीतिक अस्थिरता गहरा सकती है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राष्ट्रपति हरजोग किस दल के नेता को सरकार बनाने का मौका देते हैं और क्या गठबंधन की बातचीत सफल हो पाती है। अगर किसी भी दल को सरकार बनाने में सफलता नहीं मिलती है, तो देश को एक बार फिर से चुनाव की ओर बढ़ना पड़ सकता है, जिससे राजनीतिक संकट और गहरा सकता है।
