द इंडियन व्यू

अरावली को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

उत्तर-पश्चिम भारत के 'प्राकृतिक फेफड़े' (Natural Lungs) और थार मरुस्थल को दिल्ली-एनसीआर की ओर बढ़ने से रोकने वाली ऐतिहासिक अरावली पर्वतमाला (Aravalli Range) के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कड़ा…

Ragwendra P Singh
May 27, 2026
4 min read
अरावली को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

उत्तर-पश्चिम भारत के 'प्राकृतिक फेफड़े' (Natural Lungs) और थार मरुस्थल को दिल्ली-एनसीआर की ओर बढ़ने से रोकने वाली ऐतिहासिक अरावली पर्वतमाला (Aravalli Range) के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। अवैध खनन और अतिक्रमण से अरावली के सिकुड़ते अस्तित्व को बचाने के लिए न्यायालय द्वारा गठित 'विशेषज्ञ समिति' ने अपना कार्य आधिकारिक रूप से शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस उच्च स्तरीय समिति को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह 3 महीने के भीतर अरावली रेंज की सटीक 'सैटेलाइट मैपिंग' (Satellite Mapping) पूरी करे और अपनी विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपे।

भारत की सबसे पुरानी भौगोलिक संरचनाओं में से एक अरावली पर्वतमाला पिछले कई दशकों से भू-माफियाओं (Real Estate Mafia) और अवैध खनन (Illegal Mining) की भेंट चढ़ रही है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक लगभग 692 किलोमीटर में फैली इस पर्वत श्रृंखला की 'सटीक परिभाषा और सीमा' (Definition and Boundary) को लेकर लंबे समय से भारी विवाद चल रहा था। इसी विवाद को हमेशा के लिए सुलझाने और अरावली के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को सुरक्षित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक नई और अधिक समावेशी विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसने अब युद्ध स्तर पर अपना काम शुरू कर दिया है।

सैटेलाइट मैपिंग से तय होगी अरावली की असली सीमा

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, यह विशेषज्ञ समिति 'फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया' (FSI) और 'सर्वे ऑफ इंडिया' (Survey of India) जैसी शीर्ष वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं की मदद ले रही है।

अरावली की सीमाओं को केवल पुराने राजस्व रिकॉर्ड के कागजों से निकालकर धरातल पर सटीक रूप से चिन्हित करने के लिए अत्याधुनिक सैटेलाइट मैपिंग और जियो-टैगिंग (Geo-tagging) तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालत ने समिति को 3 महीने की सख्त मोहलत दी है। इस निर्धारित अवधि के भीतर समिति को यह तय करना होगा कि अरावली की वास्तविक भौगोलिक और पारिस्थितिक सीमाएं कहाँ तक हैं, ताकि भविष्य में कोई भी राज्य सरकार या बिल्डर कानूनी खामियों का फायदा उठाकर जंगलों की कटाई न कर सके।

जनता और डोमेन विशेषज्ञों की राय लेना किया अनिवार्य

इससे पहले, नवंबर 2025 में एक न्यायिक आदेश आया था जिसमें अरावली पहाड़ियों को केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सीमित करने की बात कही गई थी। लेकिन इस फैसले से पर्यावरणविदों में भारी चिंता फैल गई थी कि इससे अरावली का एक बहुत बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो जाएगा। जन-भावनाओं और पर्यावरण की रक्षा को देखते हुए, न्यायालय ने अपने उस फैसले पर रोक (Stay) लगा दी थी।

अब सर्वोच्च अदालत की पीठ ने स्पष्ट किया है कि नई समिति बंद कमरों में केवल नौकरशाहों तक सीमित नहीं रहेगी। समिति को निर्देश दिया गया है कि वह पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, वन अधिकारियों और सबसे महत्वपूर्ण—स्थानीय हितधारकों (Stakeholders) तथा आम जनता के साथ व्यापक विचार-विमर्श (Public Consultation) करे।

खनन और नए निर्माण पर लगाम

सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि जब तक यह 3 महीने की सैटेलाइट मैपिंग प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती और क्षेत्र के लिए एक 'सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान' (Management Plan for Sustainable Mining - MPSM) अंतिम रूप से लागू नहीं हो जाता, तब तक अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार के नए खनन पट्टे (Mining Lease) को मंजूरी नहीं दी जाएगी। इस फैसले से उन खनन माफियाओं में भारी हड़कंप मच गया है, जो पहाड़ियों को समतल करके मुनाफा कमाने की फिराक में थे।

क्यों इतना जरूरी है अरावली का संरक्षण?

अरावली पर्वतमाला केवल पत्थरों का पहाड़ नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है:

* प्राकृतिक ढाल (Green Barrier): यह थार मरुस्थल (Thar Desert) की गर्म और रेतीली हवाओं को उत्तर भारत और गंगा के उपजाऊ मैदानी इलाकों में प्रवेश करने से रोकती है।
* भूजल का खजाना (Groundwater Recharge): दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान और हरियाणा जैसे पानी की भारी कमी वाले इलाकों के लिए अरावली एक विशाल 'रिचार्ज ज़ोन' का काम करती है।
* दुर्लभ जैव विविधता (Biodiversity): यह क्षेत्र तेंदुओं, लकड़बग्घों और कई दुर्लभ वनस्पतियों व पक्षियों का अंतिम सुरक्षित प्राकृतिक आवास है।

सुप्रीम कोर्ट का यह 3 महीने का अल्टीमेटम अरावली के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। यदि सैटेलाइट मैपिंग के जरिए अरावली की संपूर्ण सीमाओं को 'इकोलॉजिकल ज़ोन' के रूप में पूरी तरह सील कर दिया जाता है, तो देश की यह अनमोल प्राकृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाएगी।

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