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राम मंदिर दान विवाद: के.सी. वेणुगोपाल ने पीएम मोदी को लिखा पत्र, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग

राघवेंद्र प्रताप सिंह/  नई दिल्ली: अयोध्या के राम मंदिर के लिए आए दान में कथित हेराफेरी और चोरी के विवाद ने अब एक बड़ा राजनीतिक रूप ले लिया है। इस पूरे मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एक निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने की मांग की है।

पत्र में उठाई गई मुख्य मांगें और चिंताएं

प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में वेणुगोपाल ने दान के पैसों में हुई कथित अनियमितताओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। पत्र में स्पष्ट किया गया है कि:

* राम मंदिर के निर्माण और व्यवस्था के लिए देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं ने अपनी गहरी आस्था और श्रद्धा के साथ अपनी गाढ़ी कमाई का हिस्सा दान दिया है।
* ऐसे में दान की गई राशि में किसी भी प्रकार की हेराफेरी या चोरी की खबरें सीधे तौर पर आम लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती हैं।
* मामले की गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए इसकी जांच केवल स्थानीय पुलिस या सामान्य एजेंसियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीश की देखरेख में एक स्वतंत्र समिति द्वारा पूरी जांच की जानी चाहिए।

क्या है पूरा विवाद?

गौरतलब है कि हाल ही में अयोध्या राम मंदिर के दानपात्रों और इससे जुड़े बैंक खातों में कथित वित्तीय अनियमितताओं और नकदी गायब होने की खबरें सामने आई थीं। हालिया रिपोर्ट्स में कुछ संदिग्धों के पकड़े जाने और पुलिस जांच में लाखों रुपये की रिकवरी की बात भी सामने आई है। इन घटनाओं के बाद से ही विपक्षी दल लगातार सरकार और मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

जवाबदेही सुनिश्चित करने पर जोर

वेणुगोपाल ने अपने पत्र में इस बात पर जोर दिया है कि देश की जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनके द्वारा दिए गए दान का एक-एक पैसा सुरक्षित है या नहीं। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस मामले में किसी भी स्तर पर हुई प्रशासनिक या सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी तय की जाए और जो भी लोग इस कृत्य में शामिल पाए जाएं, उन पर कड़ी से कड़ी कानूनी कार्रवाई हो।

विपक्ष के इस कदम से स्पष्ट है कि राम मंदिर दान विवाद अब आने वाले दिनों में राजनीतिक गलियारों में और अधिक गरमाने वाला है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और केंद्र सरकार इस पत्र और जांच की मांग पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हैं।

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