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ईडी की ‘असीमित शक्तियों’ पर सुप्रीम कोर्ट में फिर होगी बड़ी जिरह: PMLA के सख्त प्रावधानों को चुनौती देने वाली नई याचिका पर जुलाई में सुनवाई

विवेक ओझा/ नई दिल्ली | प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA, 2002) के तहत की जा रही गिरफ्तारियों और एजेंसी की ‘असीमित शक्तियों’ का विवाद एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने PMLA के कुछ बेहद सख्त और विवादास्पद प्रावधानों को मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए दायर की गई एक नई जनहित याचिका (PIL) को विचारार्थ स्वीकार कर लिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जुलाई के दूसरे सप्ताह में इस बेहद संवेदनशील और बहुचर्चित मामले पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी।

कानूनी दिग्गजों के बीच होगा महामुकाबला

इस कानूनी लड़ाई में देश के सबसे बड़े विधि विशेषज्ञों का आमना-सामना होने जा रहा है। इस नई याचिका की पैरवी और समर्थन में विपक्ष और नागरिक अधिकारों के पैरोकार माने जाने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल (Kapil Sibal) और अभिषेक मनु सिंघवी (Abhishek Manu Singhvi) अदालत में मोर्चा संभालेंगे।

वहीं, दूसरी ओर केंद्र सरकार और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के अधिकारों का बचाव करने के लिए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (Tushar Mehta) और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू (S.V. Raju) अपनी दलीलें पेश करेंगे। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) के संज्ञान में इस मामले को लाए जाने के बाद इसे जुलाई की वेकेशन के बाद वाली नियमित रोस्टर सूची में सूचीबद्ध कर दिया गया है।

याचिका में किन शक्तियों को दी गई है चुनौती?

याचिकाकर्ताओं ने अपनी जनहित याचिका में PMLA कानून की बुनियादी संरचना पर सवाल नहीं उठाया है, बल्कि उन धाराओं को चुनौती दी है जो ईडी को लगभग ‘निरंकुश’ बनाती हैं। मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर कोर्ट का ध्यान खींचा गया है:

1. धारा 45 (जमानत की दोहरी शर्तें – Twin Conditions of Bail): PMLA के तहत जमानत मिलना सामान्य क्रिमिनल कानूनों (CrPC/BNS) से कहीं ज्यादा मुश्किल है। इसमें जज को जमानत देने से पहले यह संतुष्ट होना पड़ता है कि आरोपी ‘निर्दोष’ है और भविष्य में अपराध नहीं करेगा। याचिका में इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार) का सीधा उल्लंघन बताया गया है।
2. बिना ECIR दिए गिरफ्तारी: याचिका में वर्ष 2022 के बहुचर्चित ‘विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (Vijay Madanlal Choudhary vs Union of India)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के ही उस फैसले की समीक्षा की मांग की गई है, जिसमें ईडी को यह छूट दी गई थी कि वह आरोपी को ECIR (एफआईआर का ईडी संस्करण) की आधिकारिक कॉपी दिए बिना सिर्फ गिरफ्तारी का कारण बताकर जेल में डाल सकती है।
3. ‘प्रोसेस इज द पनिशमेंट’ (प्रक्रिया ही सजा): वरिष्ठ अधिवक्ताओं का तर्क है कि ईडी का ‘कनविक्शन रेट’ (Conviction Rate – दोषसिद्धि दर) एक प्रतिशत से भी कम है, लेकिन जमानत के सख्त नियमों के कारण ट्रायल पूरा होने से पहले ही आरोपी कई सालों तक जेल में सड़ने को मजबूर होते हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि और टाइमिंग का महत्व

जुलाई में होने वाली यह सुनवाई राजनीतिक रूप से भी भूचाल लाने वाली है। हाल के वर्षों में विपक्ष के कई बड़े नेताओं, जिनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झारखंड के पूर्व सीएम हेमंत सोरेन, पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी (पूछताछ के मामले में) जैसे नाम शामिल हैं, पर ईडी का शिकंजा कसा गया है। विपक्षी दलों का ‘इंडिया गठबंधन’ (I.N.D.I.A Bloc) लगातार यह आरोप लगा रहा है कि केंद्र सरकार जांच एजेंसियों का राजनीतिक शस्त्रीकरण (Political Weaponization) कर रही है।

आगे क्या?

जुलाई में होने वाली यह सुनवाई इस बात का लिटमस टेस्ट होगी कि क्या भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर आर्थिक अपराधों से निपटने के नाम पर जांच एजेंसियों को ऐसे विशेषाधिकार दिए जा सकते हैं, जो नागरिक स्वतंत्रता और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया (Due Process) पर भारी पड़ें। विवेक ओझा की रिपोर्ट के अनुसार, मानसून सत्र से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट का यह रुख तय करेगा कि देश में PMLA का भविष्य और ईडी की कार्यप्रणाली क्या दिशा लेती है।

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