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जातिगत जनगणना पर कांग्रेस का ‘महा-दांव’: कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल में एक साथ राज्य-स्तरीय सर्वेक्षण की अधिसूचना जारी

पल्लवी श्रीवास्तव/  बेंगलुरु/नई दिल्ली | देश की राजनीति में ‘जितनी आबादी, उतना हक’ के नारे को धरातल पर उतारने के लिए विपक्ष ने एक बहुत बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। कांग्रेस आलाकमान के सीधे समन्वय के बाद, कांग्रेस शासित तीन प्रमुख राज्यों—कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश—ने आज एक साथ अपने-अपने राज्यों में ‘राज्य-स्तरीय जातिगत सर्वेक्षण’ (Caste-based Survey) शुरू करने की आधिकारिक अधिसूचना (Official Notification) जारी कर दी है।

राहुल गांधी के देशव्यापी ‘रोजगार अधिकार मार्च’ के बीच उठाए गए इस कदम को 2026 के इस चुनावी वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति का अब तक का सबसे बड़ा सामाजिक-राजनीतिक दांव माना जा रहा है।

तीन राज्यों का ‘त्रिकोणीय’ एक्शन प्लान
बिहार के जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद से ही कांग्रेस पर अपने राज्यों में इसे लागू करने का भारी राजनीतिक दबाव था। आज जारी हुई साझा अधिसूचना से साफ है कि तीनों राज्यों का प्रशासनिक तंत्र इस सर्वे को फूलप्रूफ बनाने के लिए एक ही तर्ज पर काम करेगा:

डिजिटल और डोर-टू-डोर मैपिंग: तीनों राज्यों में सरकारी कर्मचारी और शिक्षक हर घर जाकर डेटा जुटाएंगे। इस बार पूरी प्रक्रिया को पेपरलेस रखने के लिए एक विशेष और सुरक्षित मोबाइल ऐप का इस्तेमाल किया जाएगा।

सिर्फ गिनती नहीं, ‘एक्स-रे’ होगा: अधिसूचना के मुताबिक, इस सर्वे में केवल जातियों की संख्या नहीं गिनी जाएगी, बल्कि परिवारों की आर्थिक स्थिति, भूमि स्वामित्व, शिक्षा का स्तर और सरकारी व निजी क्षेत्रों में उनके प्रतिनिधित्व का पूरा डेटाबेस (Socio-Economic Data) तैयार किया जाएगा।

सख्त समयसीमा: तीनों सरकारों ने अपने-अपने सामान्य प्रशासन विभाग को निर्देश दिया है कि अगले 90 से 120 दिनों के भीतर फील्ड वर्क पूरा कर प्रारंभिक रिपोर्ट कैबिनेट के सामने पेश की जाए।

राहुल गांधी के ‘सामाजिक न्याय’ एजेंडे को मजबूती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तीन राज्यों द्वारा एक साथ अधिसूचना जारी करना कांग्रेस की एक सोची-समझी राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार देश का ‘एक्स-रे’ कराने की बात करते रहे हैं। कांग्रेस इस कदम के जरिए देश के अन्य क्षेत्रीय दलों (जैसे राजद, सपा और द्रमुक) को यह संदेश देना चाहती है कि वह सामाजिक न्याय और पिछड़े-दलित वर्गों की हिस्सेदारी के मुद्दे पर केवल चुनावी वादे नहीं करती, बल्कि उसे प्रशासनिक तौर पर लागू करने का माद्दा भी रखती है।

सियासी मायने: आरक्षण की 50% सीमा को चुनौती!
इस साझा अधिसूचना ने देश के राजनीतिक गलियारों, विशेषकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के खेमे में हलचल तेज कर दी है। इसके दूरगामी परिणाम निम्नलिखित रूपों में देखने को मिल सकते हैं:

आरक्षण की सीमा बढ़ाने की मांग: कर्नाटक और तेलंगाना में इस सर्वे के आंकड़े सामने आने के बाद, सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50% आरक्षण की सीमा को पार करने और आबादी के अनुपात में कोटा बढ़ाने का कानूनी व राजनीतिक दबाव बढ़ेगा।

क्षेत्रीय राजनीति में कांग्रेस का उभार: दक्षिण भारत (कर्नाटक-तेलंगाना) और उत्तर भारत (हिमाचल) के इस गठजोड़ से कांग्रेस खुद को पिछड़ों और आदिवासियों के सबसे बड़े मसीहा के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।

कल्याणकारी योजनाओं का नया स्वरूप: इन आंकड़ों के आधार पर तीनों राज्य सरकारें सीधे उन जातियों को टारगेट करके नई योजनाएं लॉन्च कर सकती हैं, जो अब तक विकास की मुख्यधारा से कटी हुई हैं।

निष्कर्ष
बिहार के बाद अब इन तीन राज्यों का यह कदम देश में ‘मंडल 3.0’ की राजनीति की आधिकारिक शुरुआत माना जा सकता है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन और आर्थिक विकास के नैरेटिव पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस ने ‘जातिगत कार्ड’ खेलकर पूरी पिच को बदलने का प्रयास किया है। अब देखना यह होगा कि इस सर्वेक्षण के जमीनी क्रियान्वयन के दौरान स्थानीय स्तर पर क्या प्रशासनिक और राजनीतिक चुनौतियां सामने आती हैं।

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